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बेरोज़गारी का सबसे बड़ा सच, कितने रोज़गार घटे, कितने लोग हुए बेहाल

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-दीप जगदीप सिंह-

• बेरोज़गारी पर मोदी मौन, बेरोज़गारों की निकली चीखें • महिलाओं और पुरूषों में बढ़ रहा है वेतन का गैप • नोटबंदी से परिवार में कमाने वालों की संख्या घटी
2019 के लोक सभा चुनाव (Lok Sabha Election 2019) जैसे-जैसे अपने चर्म पर पहुंच रहा है, चुनाव प्रचार भी तीखा होता जा रहा है। यह भी साफ़ हो चुका है कि अच्छे दिन और सब का विकास के वादे से बनी भाजपा सरकार के चेहरे प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी (Narendra Modi), भाजपा अध्यक्ष अमित शाह (Amit Shah) से लेकर कोई भी स्टार प्रचारक सरकार की उपलब्धियों की बजाए एक बार फ़िर जुमलों से वोटरों को लुभाने की कोशिश कर रहा है। इस से सरकार के विकास की पोल खोल कर रख दी है। 2014 के चुनाव में भाजपा (BJP) के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने हर साल 2 करोड़ रोज़गार देने का वादा किया था यानि 5 साल में 10 करोड़ रोज़गार, लेकिन सरकार बनने के बाद पिछले पांच सालों के दौरान कितने रोज़गार पैदा हुए, इस बारे में बड़े-बड़े जुमले सुनाने वाले मोदी मौन धारन किए हुए हैं। संसद से सड़क तक बार-बार सवाल पूछे जाने के बावजूद मोदी सरकार पिछले पांच स…

अरुंधतिरॉय का उपन्यास ‘अपार खुशी का घराना’और ‘बेपनाह शादमानी की ममलिकत’ का लोकार्पण

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नई दिल्ली:  विश्वप्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय के अंग्रेजी में बहुचर्चित उपन्यास ‘द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ का हिंदी अनुवाद ‘अपार खुशी का घराना’ एवं उर्दू अनुवाद ‘बेपनाह शादमानी की ममलिकत’का लोकार्पण शनिवार को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुआ। इस उपन्यास का हिंदी में अनुवाद वरिष्ठ कवि और आलोचक मंगलेश डबराल और उर्दू अनुवाद अर्जुमंद आरा द्वारा किया गया, उपन्यास को दोनों भाषाओँ में राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है।


लोकार्पण के बाद लेखिका अरुंधति रॉय, हिंदी अनुवादक मंगलेश डबराल और उर्दू अनुवादक अर्जुमंद आरा से वरिष्ठ लेखक संजीव कुमार एवं आशुतोष कुमार ने बातचीत की।

कार्यक्रम की शुरूआत दास्तानगो दारेन शाहिदी द्वारा पुस्तक से मधुर अंशपाठ कर किया गया।

इस मौके पर लेखिका अरुंधति रॉय ने कहा “ मेरी यह पुस्तक अब तक देश –विदेश के 49 भाषाओँ में अनुवाद हो चुकी है और अब हिंदी और उर्दू में आते ही मेरे लिए पूरी हो गयी है।” आगे उन्होंने कहा “‘द गॉड ऑफ़ स्माल थिंग्स’ उपन्यास की सफलता और बुकर पुरस्कार मिलने के बाद, मैं चाहती तो द गॉड ऑफ़ स्माल थिंग्स, भाग-2और 3 भी लिख सकती थी, लेकिन मेरे लिए उ…

बीयर चाचा चले गए #ATrueStory

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वह मुहल्ले के सबसे हेंडसम जेंटलमैन थे। सादे लेकिन बेहतरीन ढंग से कपड़े पहनने में उनका काेर्इ सानी नहीं था। कर्इ पगड़ी बांधने वाले लड़के उनके पगड़ी के पेचाें, जिन में एक भी बल नहीं हाेता था, से जलते थे अाैर उन जैसी पगड़ी बांधना सीखने के बहाने ढूंढते रहते थे। अकसर अल सुबह, चमकता हुअा सफ़ैद पयजामा अाैर अाधी बाजू वाली बनियान पहने, वह हमारे घर के सामने वाली कपड़े इस्त्री की दुकान पर खड़े हाेते। जब वह हमें वहां खड़े अख़बार पढ़ते, गप्पे हांकते अाैर बेलाैस हंसते हुए नज़र अाते, ताे असल में उनकी तिरछी नज़र कपड़े इस्त्री करने वाले पर लगी रहती अाैर इस्त्री वाला तब तक लगा रहता जब तक अाख़री बल ना निकाल दे। इसी लिए वह वहीं खड़े रह कर कपड़े प्रैस करवाते थे। स्कूल जाते वक्त हम उन्हें अच्छी सी फिटिंग वाली पतलून, अंदर खाेंसी हुर्इ कमीज़, मैचिंग पगड़ी अाैर कस के बंधी हुर्इ दाढ़ी अाैर चमकते हुए काली पॉलिश वाले जूते पहने बजाज चेतक स्कूटर पर चढ़ कर जाते हुए देखते। उनका स्कूटर अाज भी मुहल्ले के सबसे पुराने एेसे स्कूटराें में से एक है। पेशे से वह फर्मासिस्ट थे। कर्इ बड़ी दवा कंपनियाें में एमअार की नाैकरी करन…

मोदी की नीयत बनाम जियो की नीयति

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-दीप जगदीप सिंह- जियो इंस्टीच्यूट के पैदा होने से पहले ही उसे ‘इंस्टीच्यूट ऑफ एमिनेंस’ का तमगा देने पर बवाल मचा हुआ है, जियो इंस्टीच्यूट की नियति क्या होगी यह तो भविष्य तय करेगा, लेकिन इस फ़ैसले ने मोदी सरकार की देश की शिक्षा नीति और देश के नौजवानों के भविष्य को लेकर नीयत एक बार फिर साफ़ कर दी है। एक तरफ़ मोदी सरकार ने जहां 17 दिग्गज़ों की कमेटी बना कर उन्हें भारत के इतिहास का भगवाकरण करने के काम पर लगाया हुआ है तो दूसरी तरफ़ तेज़ी से समूचा शिक्षा ढांचा और नीति कॉरपोरेट और निजी फ़ायदे के अनुरूप ढाली जा रही है। ऐसे में जियो इंस्टीच्यूट के नामो निशान तक ना होने के बावजूद उसे उत्कषर्टता का अस्थायी दर्जा देना भी हैरान करने वाली बात नहीं है। बल्कि इस कदम से मोदी सरकार ने तो खुले तौर पर ऐलान कर दिया उसकी शिक्षा नीति की दिशा और दशा क्या होगी और उसे किससे हित सर्वोपरि हैं।


क्या है भला क्या है इंस्टीच्यूट ऑफ एमिनेंस है? जाननें के लिए क्लिक करें
इतना हंगामा क्यों है बरपा? जैसे ही कल शाम को जियो इंस्टीच्यूट को इंस्टीच्यूट ऑफ़ एमिनेंस देने की घोषणा हुई तभी से सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक और शैक्षिणक गलियार…

जियो का बवालः भला क्या है इंस्टीच्यूट ऑफ एमिनेंस है?

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देश के शिक्षण संस्थानों को दुनिया के टॉप 100 की सूची में लाने के लिए केंद्र सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय ने एक योजना बनाई है, जिसके तहत देश के 20 शिक्षण संस्थानों को इंस्टीच्यूट ऑफ एमिनेंस का दर्जा दिया जा रहा है। इसके लिए यूजीसी द्वारा बनाई गई एम्पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी (ईईसी) ने सभी उच्च शिक्षण संस्थानों से आवेदन मांगे गए थे। उत्कर्षट संस्थान का दर्जा पाने के लिए देश के कुल 114 संस्थान दौड़ में शामिल हुए, जिन में 11 सेंट्रल यूनिवर्सिटीज़, 27 राष्ट्रीय महत्व के उच्च शिक्षण संस्थान, आईआईटीज़ एवं एनआईआईटीज़ आदि, 27 राज्य यूनिवसिर्टीज़ और 10 प्राईवेट यूनिवसिर्टीज़ शामिल हुईं। प्राईवेट इंस्टीच्यूट्स में ऐयरटेल की भारती यूनिवर्सिटी (सत्या भारती फाउंडेशन), दिल्ली, अनिल अग्रवाल की वेदांता यूनिवर्सिटी, ओडिशा, करिया यूनिवर्सिटी, इंडियन स्कूल ऑफ बिज़नेस हैदराबाद, इंडस टेक यूनिवर्सिटी दिल्ली, अचार्य इंस्टीच्यूट ऑफ बंगलौर शामिल थे।


मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर द्वारा टवीटर पर जारी किए गए दस्तावेज़ों के मुताबिक कैटेगरी 1 में उन संस्थानों को रखा गया जो पहले से मौजूद हैं जबकि एक ग्रीन कैटेगरी बनाई गई ज…

तेरी जाति क्या?

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नाटक की भला कोई जाति होती है क्या? लेकिन नाटक जाति के सवाल पर बहुत गंभीर विमर्श कर सकता है। ख़ास कर उस शहर में जहां पर नाटक भी अछूत माना जाता है।

असल में नाटक बड़ा दमदार माध्यम है। अगर इसे जी-जान से किया जाए तो दर्शकों को अंदर तक हिला देने की कुव्वत रखता है। पंजाब में नाटकों की विभिन्न किस्म की परंपराएं रही हैं। पूरी सीरिज़ में देखता हूं तो लुधियाना शहर नाटक के बड़े केंद्र के रूप में उभरता हुआ नज़र आता है। दशक भर पहले अमृतसर में निजी प्रयास से सम्पूर्ण आॅटोमेटेड रंगमंच का आगमन हुआ। वहां अब वीकऐंड रंगमंच का चलन आम हो गया है। लोग टिकट ख़रीद कर नाटक देखने आते हैं। दिल्ली, मुंबई जैसी फीलिंग आती है।


दूसरी तरफ़ लुधियाना जैसे इंडस्ट्रियल शहर का नाटक अभी भी दानियों के रहमो-कर्म और रंगमंच संस्थानों के निजी प्रयासों तक सीमित है। पंजाबी साहित्य अकाडमी का ओपन ऐयर थिएटर हौसला बढ़ाता है। लेकिन पपड़ी बन कर धीरे-धीरे गिर रही इसकी छत डराती है। अकाडमी बिना किसी फ़ीस के उत्साही रंगकर्मियों को इसे उपलब्ध करवा देती है। लाइट, साउंड, सेट और ड्रसेस पर ही काफ़ी ख़र्च हो जाता है। लेकिन इस सब के बीच रंगमंच रंगनगरी ऐसा …

Film Review | Mom | फ़िल्म | समीक्षा मॉम

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-दीप जगदीप सिंह-रेटिंग 3/5

कथा - रवि उदयावर गिरीश कोहली कोना वेंकेट राओ
पटकथा एवं संवाद - गिरीश कोहली 
निर्देशक - रवि उदयावर
मॉम मैम से मां बनने की कहानी है। यह एक मां की कहानी है, जिसे उम्मीद है कि उसकी बेटी एक दिन उसे मैम नहीं मां कहेगी। यह एक बेटी की भी कहानी है जो सोचती है कि 'मां की ज़िंदगी में बेटी आती है ना कि बेटी की ज़िंदगी में मां आती है।' मॉम एक बार फ़िर यह भी प्रमाणित करती है कि पालने-पोसने वाली मां भी जन्म देने वाली मां जितनी ही ममतामयी हो सकती है। इसके अलावा मॉम कानून और न्याय व्यवस्था के चरमरा कर ध्वस्त हो चुके उस दौर की भी कहानी है, जो अराजकता पनपने के लिए उर्वर भूमि प्रदान करने का माहौल पैदा करता है।
बॉयलॉजी टीचर देविका (श्रीदेवी) पढ़ाई और अनुशासन के मामले में सख़्त भी है और पढ़ाई को रोमांचक बनाने जितनी आधुनिक भी। दुनिया की नज़र में वह अपने बिजनेसमैन पति आनंद (अदनान सद्दीकी), बेटियों आर्या (सजल अली) और प्रिया के साथ हंसी-खुशी जीवन गुज़ार रही है, लेकिन आनंद की पहली पत्नी की बेटी आर्या अठारह साल की हो जाने के बावजूद आज भी ना अपनी जन्म देने वाली मां को भूल सकी है ना ही…

Movie Review | Padman | पैडमैन

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दीप जगदीप सिंह | रेटिंग 2.5/5
फ़िल्म देखने जाते समय मुझे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि फ़िल्म लेखन के मामले में एक अच्छी पटकथा की उदाहरण हो सकती है। मुझे लगा था कि टाॅयलेट एक प्रेम कथा की तरह ही पैडमैन भी दो घंटे का एक सरकारी विज्ञापन होगी, लेकिन इस बार फ़िल्म के लेखन ने मुझे प्रभावित किया है और जो लोग फ़िल्म लेखन में रूचि रखते हैं, उन्हें यह समीक्षा अंत तक पढ़नी चाहिए, उन्हें इसमें बेहतर सक्रीन राइटिंग के काफ़ी मंत्र मिलेंगे। चाहे यह एक परफ़ेक्ट फ़िल्म नहीं है लेकिन कहानी के ग्राफ़ और किरदारों के ग्राफ़ के मामले में इस फ़िल्म में काफ़ी कुछ सीखने वाला है।
फ़िल्म में अक्षय कुमार बने है लक्ष्मीकांत चौहान उर्फ़ पैडमैन, उनकी पत्नी गायत्री के रोल में है राधिका आप्टे और प्रेमिका और प्रमोटर के रूप में हैं, सोनम कपूर। फ़िल्म का संकल्प है टविंकल खन्ना का और फ़िल्म लिखी है आ बाल्की और सवानंद किरकिरे ने, निर्देशन भी है आर बाल्की का।

कहानी
पैडमैन की कहानी औरतों की मासिक समस्या महावारी, मासिक धर्म, पीरियडस, चम्ज़ और जिसे मज़ाक में लड़के फाइव डे टेस्ट मैच कहते हैं, और कुछ लोगों को मैंने इसे नो एंट्री डे कहते भी सुना है…