नेशनल हेराल्ड । राजनीति का भ्रष्टाचार या भ्रष्टाचार की राजनीति

दीप जगदीप सि‍ंह । नेशनल हेराल्ड के मामले में एक बार फिर राजनैतिक भ्रष्टाचार के मुद्दे को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। भाजपा नेता सुब्रामणियम स्वामी द्वार दिल्ली की अदालत में दायर किए गए मामले ने सोमवार को गांधी परिवार में भूचाल ला दिया, वहीं भाजपा के गलियारों में इसके स्वागत की सुगबुगाहट सुनाई देती रही। राजनेताओं द्वारा राजनेताओं के खि़लाफ दायर किए गए मामलों में राजनीति से इंकार नहीं किया जा सकता है।
 
बड़ा सवाल यह है कि संबंधित मामले का राजनैतिक फायदा कौन सी पार्टी उठाने में सफल होती है। सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सोनिया व राहुल गांधी सहित अन्य पांच याचिकाकर्ताओं सुमन दूबे, मोती लाल वोहरा, आॅस्कर फर्नांडिस, सैम पित्रौदा और यंग इंडिया लिमिटेड को अदालत में पेश ना होने की अपील को नामंज़ूर कर दिया है। अब उन्हें निचली अदालत द्वारा जारी किए गए आदेश का पालन करते हुए 19 दिसंबर को को अदालत में पेश होना होगा। इससे एक बार तो इस राजनैतिक कानूनी उठापटक में भाजपा को फायदा होता नज़र आ रहा है। 

लोक सभा चुनावों के बाद लगातार हाशिए पर जाती कांग्रेस पार्टी को बिहार चुनाव में महागठबंधन की जीत से थोड़ा बहुत प्रोत्साहन मिला था लेकिन इस अदालती आदेश ने गांधी परिवार को बड़ा झटका दे दिया है। पार्टी आकाओं को मुसीबत में घिरे देख पूरी कांग्रेस पार्टी भी सकते में आ गई है और नई बनी इस स्थिति को पार्टी के लिए हमदर्दी जुटाने से लेकर राजनैतिक पटल पर अपनी जगह फिर से बनाने के लिए प्रयोग करने की कोशिश में लगी हुई है। लेकिन अफसोस इस काम के लिए उन्होंने संसद के शीतकालीन सत्र में बाधा डालने का जो रास्ता अपनाया है, उसका फायदा कम और नुकसान ज़्यादा होने की संभावना लग रही है। वहीं भाजपा ने इस मुद्दे पर हमलावर रुख़ ना अपना कर अपने आप को सहज को दिखाने और राहुल गांधी के राजनीति से प्रेरित मामले वाले बयान को विफल करने की जो राजनैतिक पहुंच अपनाई है वह उसमें काफी हद तक सफल नज़र आ रही है। मानसून सत्र में भी संसद में बाधा डालने की कार्यावाही काग्रेंस के खिलाफ गई थी, इस बार भी भाजपा को वही फायदा हो सकता है। इस सियासी उठापटक में एक बार फिर जनता के ख़ून पसीने की कमाई के करोड़ों रूपए राजनैतिक बाढ़ में बह जाने और संसद की कार्यावाही ना चल पाने से होने वाले नुकसान सब के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। 


राब्र्ट वाड्रा के बाद यह दूसरा ऐसा बड़ा मामला है जिसमें गांधी परिवार सीधे घिरता हुआ नज़र आ रहा है, इसलिए कांग्रेस पार्टी में खलबली मचना स्वाभाविक है। वहीं एक वर्ग ने देश में भ्रष्टाचार के मुद्दे को नया रुख़ देने वाले आप नेता और दिल्ली के मुख्य-मंत्री अरविंद केजरीवाल की नेशनल हेराल्ड के मामले में चुप्पी पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। इधर जैसे ही गांधी परिवार को अदालत के आदेश की सूचना मिली हालात की नाज़ुकता को समझते हुए उन्होंने तुरंत हमलावर तेवर अख़्तयार कर लिए। एक तरफ सोनिया गांधी ने खुद मोर्चा संभालते हुए अपने को इंदिरा गांधी की निडर बहु कह डाला तो राहुल गांधी ने भी मौका संभालते हुए इसे राजनीति से प्रेरित मामला बता कर साहनुभूति बटोरने की कोशिश की और बाढ़ पीडि़तों का हाल-चाल जानने के लिए चेन्नई चले गए। अब कांग्रेसी नेता सोशल मीडिया से लेकर ज़मीनी स्तर पर सोनिया गांधी का इंदिरा की बहु वाला बयान भुनाने पर लगे हुए हैं।


क्या है नेशनल हेराल्ड मामला
नेशनल हेराल्ड नामक अख़बार पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1938 में शुरू किया था, जिसकी स्वतंत्रा संग्राम में अहम भूमिका मानी जाती है। 2008 में ख़राब आर्थिक हालात की वजह से अख़बार बंद हो गया। इसे बचाने के लिए कांग्रेस ने इसकी संचालक कंपनी एजीएल को 90 करोड़ का बिना ब्याज का असुरक्षित लोन दिया। यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी ने यह कजऱ् चुकाने के बदले एजीएल के 99 प्रतिशत शेयर खरीद लिए। दिलचस्प बात यह है कि यंग इंडिया कंपनी में सोनिया और राहुल गांधी की के सबसे ज़्यादा शेयर हैं। मोती लाल वोहरा कोएजीएल के डायरेक्टर से डील करने की जिम्मेदारी दी गई। उसे भी ज़्यादा रोचक बात यह है कि यंग इंडियन, एजीएल और क्रांगेस तीनों के संचालकों में गांधी परिवार के सदस्य शामिल हैं। सुब्रामणियम स्वामी का आरोप है कि एजीएल कंपनी की 2000 से 5000 करोड़ की संपत्ति को हथियाने के लिए गांधी परिवार ने 90 करोड़ का लोन देने की साजिश रची। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में चल रहे इस मुकदमे में पेशी से बचने के लिए गांधी परिवार लंबे अर्से से अदालती दांव-पेच अपना रहा था, जिस पर सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने विराम लगाते हुए, उन्हें पेशी से राहत देने के लिए साफ इंकार कर दिया। अब उन्हें 19 दिसंबर को हर हालत में अदालत में पेश होना पड़ेगा। गौरतलब है कि कांग्रेस ने इस लेन-देन की जांच आयकर विभाग भी कर रहा है। इसी बीच यह भी ख़बर आई है कि मामले की सुनवाई कर रही जज गोमती मनोचा का तबादला हो गया है। अगली तारीख तक उनकी जगह नया जज लेगा। इसी मुद्दे पर पत्रकार सागरिका घोष ने टविटर पर सवाल पूछा है कि कांग्रेस ने तब नेशनल हेराल्ड को बेलआउट क्यों किया जब उसे एक निजी कंपनी खरीद चुकी थी। तब अख़बार का मालिकाना हक कांग्रेस पार्टी के पास क्यों नहीं रहा? सोनिया गांधी इंदिरा गांधी की निडर बहू वाले बयान पर टिप्पणी करते हुए राजनैतिक विशलेषकों का कहना है कि अगर सोनिया गांधी इस अपनी सास से प्रेरणा लेती हैं तो उन्हें बेहिचक अदालत में पेश हो जाना चाहिए क्यों कि इंदिरा गांधी प्रधान मंत्री होते हुए 18 मार्च 1975 को अदालत में पेश होकर ऐसा करने वाली पहली प्रधानमंत्री बन गई थी।
national herald sonia gandhi rahul gandi in court
राहुल व सोनि‍या गांधी को नेशनल हेराल्‍ड मामले में अदालत में पेश होने का आदेश (फोटो-एचटी)


उधर शीतकालीन सत्र में अपना महत्वकांक्षी जीएसटी बिल पास करने के सपने देख रही मोदी सरकार के लिए भी मामला उलझन भरा हो गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने 2016 तक जीएसटी लागू करने की घोषणा कर रखी है। इसे पास करवाने के लिए एक कदम आगे बढ़ाते हुए मोदी ने सोनिया गांधी को चाय पर बुलाया था, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी शामिल हुए थे। लेकिन अब सोनिया गांधी के बदले तेवरों को देखते हुए जीएसटी के मामले में भाजपा के माथे पर चिंता की लकीरें आना भी स्वभाविक है।

पत्रकारों पर चुटकी
जहां नेता इस मामले में एक दूसरे पर बयानों के वार करने में जुटे हुए हैं वहीं लोगों ने टवीटर पर पत्रकारों की चुटकी लेने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। ऐसी ही एक टवीट में आईएनएन हैंडल ने तहलका की पत्रकार राना आयूब, आईबीएन के संपादक राजदीप सरदेसाई और एनडीटीवी की पत्रकार बरखा दत्‍त पर चुटकी लेते हुए कहा है कि उन्हें सूत्रों से सूचना मिली है कि यह अपना टविट्र का पासवर्ड भूल गई हैं और सोनिया व राहुल पर टिप्पणी नहीं कर पा रहे हैं। वहीं बाबू भैया नाम के टविटर हैंडल ने बरखा दत्त पर चुटकी लेते हुए एक कंकाल की तस्वीर के साथ लिखा है कि यह तस्वीर एनडीटीवी के उस दर्शक की है जो बरखा दत्त द्वारा राहुल सोनिया मामले पर ज़ोरदार बहस के कार्यक्रम का इंतज़ार कर रहा है।
 

अंतिका
इस सियासी उठापटक का परिणाम कुछ भी फिलहाल देश की जनता चाहती है कि संसद सत्र पर उसकी जेब से खर्च होने वाले करोड़ों रूपयों का उनके हित में प्रयोग हो। अदालत अपना काम करे और नेता जनता के प्रति अपने जिम्मेदारी निभाएं और अगर उन्होंने कोई अनैतिक कार्य किया है तो कानून अनुसार उसकी सज़ा पाएं। लेकिन आज के दौर में यह दूर का सपना ही लगता है।
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