फि‍ल्‍म समीक्षा: घायल वन्स अगेन

दीप जगदीप सिंह । इस बार अजय घायल नहीं है मानसिक तौर पर बीमार है। दरअसल अपने अपने परिवार को मौत और अपने आप पर लगे दाग़ का बदला लेने के लिए बलवंत राय को मौत के घाट उतारने और चैदह साल जेल की सज़ा काटने के बाद भी उसके मानस पर लगे घाव भर नहीं पाए हैं। अब वह एक अख़बार चलाता है जो भ्रष्ट राजनीति, व्यापारी और पुलिस तंत्र को नंगा करती है और पीडि़तों को इंसाफ दिलाती है। ऐसे मामले हल करने के लिए अजय मेहरा के पास स्टिंग आॅपरेशन और आधुनिक तकनीक के साथ-साथ अपना ढाई किलो का हाथ भी है। 
 
सबसे पहले बात यह कि घायल वन्स अगेन बाॅलीवुड का खालिस स्क्विल है। इसकी कहानी वहीं से आगे बढ़ती है जहां पर 1990 में घायल की खत्म हुई थी। दर्शकों को याद करवाने के लिए फिल्म के शुरू में ही ब्लैक एंड व्हाईट फ्लैशबैक दिखाया जाता है जो वहां पर आकर नई कहानी से जुड़ता है जहां पर अजय बलवंत राय का कत्ल करने के बाद जो डिसूज़ा के सामने सरेंडर कर देता है। 14 साल जेल काटने के बाद अजय मेहन सत्यकांत अख़बार का संपादक है जिसमें उसका साथ रिटायर्ड पुलिस अफसर एवं आरटीआई एक्टिविस्ट (ओम पूरी) और उसके कुछ दोस्त देते हैं। अतीत की छाप अजय के ज़ेहन में इतनी गहरी है कि अभी भी उसे तंग करती है, अपने नर्व-सिस्टम को संतुलित रखने के लिए उसे दवा लेनी पड़ती है और उसे यह दवा देने के लिए हर पल उसके साथ उसकी डाॅक्टर (सोहा अली ख़ान) रहती है। लोगों को न्याय दिलाने के अपने अंदाज़ की वजह से अजय मेहरा युवाओं और आम लोगों का हीरो है। कहानी में मोड़ तब आता है जब उसके चार युवा फैन रोहन (शिवम पाटिल), अनुष्का (आंचल मुंजाल), वरूण (ऋषभ अरोड़ा) और ज़ोया (डायना ख़ान) अनजाने में ताकतवर बिजनेसमैन राज बंसल (नरेंद्र झा) के बेटे के हाथों जो डिसूज़ा के मुंबई के गृह मंत्री (मनोज जोशी) की उपस्थिती में कत्ल के ना सिर्फ चश्मदीद गवाह बन जाते हैं, बल्कि उसका सुबूत भी उनके कैमरे में रिकार्ड हो जाता है। सोशल मीडिया के क्रांतिवीर चारो युवाओं को न्याय के लिए अपने परिवार से निराशा हाथ लगती है तो वह अपने हीरो अजय मेहरा तक सुबूत पहुंचाने के लिए निकलते हैं, लेकिन हाईटैक राज बंसल अपने आलीशान गगनचुंबी बंगले में बैठा अपनी हैकिंग टीम और विदेशी गुंडों के ज़रिए उन्हें रस्ते में ही सुबूत सहित खत्म करने की कोशिश करता है। वह लगभग इसमें सफल भी हो जाते हैं तब अचानक अजय मेहरा उन्हें बचाने के लिए मौके पर पहुंच जाता है, लेकिन इस भागमभाग में सुबूत वाली हार्डड्राइव शाॅपिंग माॅल में छूट जाती है। इधर अजय मुश्किल से सुबूत हासिल करता है तो राज बंसल चारों युवाओं को किडनैप कर लेता है। अजय मेहरा के सामने अब एक ही सवाल है कि सुबूत दिखाकर बंसल और गृह मंत्री को एक्सपोज़ करे या युवाओं की जान बचाए। आखि़र उसे घुटने टेकने पड़ते हैं, लेकिन घायल अजय मेहरा क्या इतनी आसानी से हार जाएगा। वो भी तब जब उसके अतीत का एक भावुक सच अचानक उसके सामने आकर खड़ा हो गया। अब यह लड़ाई सिर्फ नेकी और बदी की नहीं, उसके अपनी जि़ंदगी से जुड़े एक अहम रिश्ते को बचाने की भी है।
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कहानी की बात करें तो बेहद प्रडिक्टेब्ल होने के बावजूद तीनों लेखकों ने कहानी में ऐसे रहस्य डाले हैं कि उनके खुलने पर दर्शक एक बार तो चकित होता ही है। समस्या एग्ज़ीक्यूशन की है, बतौर निर्देशक सन्नी दयोल इतनी ज़्यादा सिनेमैटिक आज़ादी ले जाते हैं कि रियलिस्टिक होते हुए भी कहानी फिल्मी और स्तरीय लगने लगती है। न चाहते हुए भी घायल वन्स अगेन की तुलना घायल से करने से बचा नहीं जा सकता। 1990 में घायल इस लिए सफलत्म फिल्म रही थी क्योंकि तब जो मसले लिए गए थे वह उस दौर में प्रासंगिक लगते थे। भ्रष्टाचार, बलात्कार और कानून व गुंडा तत्वों का संगम आज के दौर के भी विषय है लेकिन हाईटैक दौर का दर्शक उन्हें अलग नज़रिए से देखता-समझत है। उसके साथ ही फिल्म में मनोरंजन के हर रस रोमांस, काॅमेडी, ट्रेजडी, एक्शन, ड्रामा मौजूद था। घायल वन्स अगेन में ना तो सन्नी दयोल और मीनाक्षी शेशादरी जैसा चुलबुला रोमांस है, ना राज बब्बर, मौसमी चैटर्जी और सन्नी दयोल वाला पारिवारिक जुड़ाव और ना ही विजू खोटे और सन्नी दयोल का उस्ताद-शार्गिद वाला हंसोड़ टकराव। उससे भी बड़ी बात कि जो भी होगा देखा जाएगा और डोंट से नो जैसे सूपर हिट गानो वाली घायल के सीक्वल के पास गर्व करने के लिए कोई गाना ही नहीं है। तकनीक से नई रंगत तो दी गई है बावजूद इसके कहानी में नयापन बिल्कुल नहीं है। बलात्कार के बाद पत्रकार युवती का परिवार की इज्ज़त की खातिर खुदकुशी कर लेना 21वीं सदी में किसी के गले नहीं उतरता। ट्रेन से कार के एक्सीडेंट, कार से सीधे टकराने, कनपटी के पास से गोली छू के गुज़र जाने के बावजूद हीरो का खड़ा रहना अब युवा पीढ़ी को यथार्थवादी नहीं लगता। बावजूद इन सब ख़ामियों के घायल वन्स अगेन की कहानी में रफ्तार बनी रहती है और पलक झपकने का मौका नहीं मिलता।
 


इसका श्रेय डाॅक्यरेक्टर सन्नी दयोल और हाॅलीवुड एक्शन कोर्डिनेटर व फिल्म सैकेंड यूनिट डायरेक्टर डैन ब्रेडले को जाता है, जिन्होंने पहले मुंबई के ट्रैफिक भरे रोड से लेकर शाॅपिंग माॅल के अंदर तक का लम्बा और लगातार रोमांचक बने रहना वाला एक्शन सीक्वेंस फिल्माया है। उसके बाद सन्नी दयोल और बंसल के विदेशी गुंडों के साथ भीड़-भाड़ भरी सड़कों, लोकल ट्रेन और इमारतों के बीच का चेज़ सीन भी लगातार दर्शक को सीट के कोने पर चिपके रहने के लिए मजबूर करता है। फिर भी बहुत जगह पर ली गई अनावश्यक सिनेमैटिक आज़ादी रोमांचक एक्शन दृश्यों को हल्का बना देती है। चरम सीमा तो तब हो जाती है जब सन्नी दयोल गंगनचुंबी इमारत में हैलीकाॅप्टर की टक्क्र मार देते हैं और बिना एक भी खरोच आए लड़ने के लिए सीधे खड़े हो जाते हैं। सन्नी और गुंडे दोनों ही बहुत आसानी से तेज़ रफ्तार वाहनों और ट्रेनों के नीचे से चूहों जैसी चपलता से सरक कर निकल जाते हैं। सन्नी का एक लोकल से सामानांतर जा रही दूसरी लोकल पर बिना खरोंच आए कूदना हास्यास्पद लगता है। भरी हुई लोकल में जब सैंकड़ो लोग अपने हीरो अजय मेहरा को पहचान लेते हैं, फिर भी उसकी मदद के लिए कोई नहीं आता ये भी हैरान करता है। 
वह कुछ अनसुलझे सवाल भी छोड़ जाते हैं जैसे सोहा अली ख़ान अगर केवल सन्नी दयोल की डाॅक्टर हैं तो वह हर पल यहां तक कि उसके घर में भी उसके साथ क्यों रहती है। अगर वह प्रेमिका या पत्नी है तो वह उसकी बीमारी या काम के सिवा कभी कोई और बात क्यों नहीं करते। पहले हिस्से के अतीत के एक किरदार के बारे में एक बुज़ुर्ग द्वारा सन्नी दयोल को नहीं बताया जाता, लेकिन सोहा अली ख़ान को भी क्या उस किरदार के बारे मे कुछ पता नहीं होता जबकि पूरे इलाज के दौरान सन्नी दयोल उसका नाम चिल्लाता रहता है। यहां तक की उसके मानसिक रोग में उस किरदार की बड़ी भूमिका होती है, लेकिन उसकी मनोरोग विशेषज्ञ डाॅक्टर इलाज के दौरान उस किरदार को पूरी तरह नज़रअंदाज़ क्यों कर देती है। जब एक मोड़ पर आकर वर्तमान में उस अतीत के किरदार की कड़ी सन्नी दयोल से जुड़ती है तब भी सोहा अली ख़ान कोई प्रतिक्रिया नहीं देती। अगर सन्नी की जि़ंदगी में आने वाले उतार चढ़ाव से सोहा को कोई फर्क पड़ता ही नहीं तो वह हर जगह क्या सिर्फ उसे उसकी दवा याद करवाने के लिए साथ रहती हैं? सन्नी दयोल की एंट्री वाला दृश्य उनकी अब तक की सबसे भद्दी एंट्री के तौर पर याद किया जाएगा।
 


एक्टिंग के मामले में सन्नी दयोल अपने चिर-परिचित अंदाज़ में ख़ूब जमे हैं। उन्होंने अपने घायल, जीत, जिद्दी और सलाखें सरीखे किरदारों को एक बार फिर से जीवंत करने की कोशिश की है, लेकिन अफसोस कि दर्शक अब इस सब से बहुत आगे निकल चुका है, जब केवल ढाई किलो के हाथ के साथ हीरो अमेरीकी फौज जैसे प्रशिक्षित दुश्मनों पर भारी पड़ जाता है। जैसे कि पहले कह चुके हैं सोहा अली ख़ान के पास करने के लिए कुछ था ही नहीं। चारो युवा लड़के-लड़कियों ने अपने किरदारों को अच्छे से जिया है, बावजूद इसके के उन्हें भी केवल एक प्रापर्टी के तौर पर ही प्रयोग किया गया। टिस्का चोपड़ा ने पुत्र और पति प्रेम में झूलती महिला के हाव-भाव को पर्दे पर उतराने की भरकस कोशिश की है, लेकिन उन्हें भी ज़्यादा मौका नहीं मिला है। नादिरा बब्बर के हिस्से भी केवल एक दृश्य आया है जिसे वह पूरी ईमानदारी से निभा गई हैं। पूरी फिल्म में हमेशा की तरह सन्नी दयोल वन मैन आर्मी की तरह छाए रहते हैं। चालाक बिजनैसमैन, बिगड़ैल बेटे के बाप और डोमिनेटिंग पति और बेटे के अलग-अलग शेड्स वाले किरदार के रूप में नरेंद्र झा अपनी छाप छोड़ते हैं। लेकिन ना जाने सन्नी दयोल ने क्यों मेन विलेन की बजाए उसके टटपुंजिए विदेशी पालतू गुंडे को आधी से ज़्यादा फुटेज दी है। डरपोक, कमीने और चापलूस नेता के किरदार को मनोज जोशी भी बखूबी निभा गए हैं। लेकिन दोनों मिल कर भी अमरीश पूरी के बलवंत राय के कमी पूरी नहीं कर सकते।
 
संगीत के मामले में भी घायल वन्स अगेन दर्शकों को निराश ही करता है और कहा जा सकता है कि खुश भी करता है क्योंकि फिल्म में गानो के लिए कोई जगह थी ही नहीं। सन्नी ने गाने ना रख कर खाहमखाह फिल्म की लंबाई बढ़ने से बचा लिया है। विपिन मिश्रा का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के रोमांच को बनाए रखता है। 
दमदार एक्शन, सन्नी दयोल के दमदार किरदार, सन्नी दयोल स्टाईल स्टिरियोटाइप मसाला मनोरंजन और सामाजिक मसलों के गिर्द बुनी गई कहानी के लिए फिल्म को ढाई स्टार तो दिए ही जा सकते हैं। अगर आप सन्नी दयोल के डाई हार्ड फैन हैं तो आप फिल्म देख सकते हैं। बिना शक आप को घायल वन्स अगेन देखते हुए कहीं-कहीं हाॅलीवुड फिल्म डाई हार्ड वाली फीलिंग आएगी। बस याद रखिएगा ये डाई हार्ड नहीं घायल वन्स अगेन है। नहीं तो आप की उम्मीदें भी घायल हो जाएंगी!
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