कन्हैया के नाम एक खुला खत

कन्हैया कुमार! जब से तुमने जेएनयू परिसर से आज़ादी की हुंकार भरी है, पूरा देश तुम्हारी ओर बेहद उम्मीदों से देख रहा है। जब कुछ चैनलों ने तुम्हारे भाषण की छेड़छाड़ वाली वीडियो प्रसारित की थी तो मन कह रहा था कि घोर अन्याय हुआ है तुम्हारे साथ, जब काले कोट पहने कुछ लोगों ने तुम पर हमला किया था तो बेहद दर्द भी हुआ था।
 
 तुमने जो इन सब दिनों में झेला है वह हमारे सिस्टम की एक बानगी दिखाता है। तुम भली भांति जानते हुए को नायक्तव वाला जो आभास इस वक्त तुम महसूस कर रहे हो, वह इस सिस्टम की ख़ामियों से ही उत्पन्न हुआ है। यह पत्र लिखने का विचार मुझे तब आया जब रवीश कुमार के साथ इंटरव्यू में तुमने कहा कि कोट छोड़ कर तुम सोच को पकड़ कर एकजुटता पैदा करना चाहते हो। ऐसा कहके तुमने उन लाल कटोरे वालों को भी नाराज़ कर दिया होगा जो किसी दूसरी सोच को प्रयोगशाला वाले चिमटे से भी उठाने की इच्छा नहीं रखते, चाहे-अनचाहे अभी तुम्हारा समथर्न कर रहे हैं। तुम्हें पता ही होगा कि भारतीय समाज की फैक्टरी में पहले भी ऐसे बहुत से नायकों का उत्पादन हुआ है जिन्हें माहौल और मौके के अनुसार दलगत राजनीति ने अपने कंधों पर बिठाया है, चैंक-चैराहे, गली-गली घुमाया है, अब तो मीडिया का दौर है, तुम्हारे नायकत्व की मुस्कान, आक्रोश, शब्द और हुंकार मेरे ड्राईंग रूम में भी गूंज रही है, मेरे पड़ोसी के भी और बेगुसराय में तुम्हारे पड़ोसी के घर के किसी कोने में रखे टीवी पर भी। पिछले कुछ दिनों से तुम जेल में होकर भी हर जगह हो और जेल से बाहर आते ही तुम अपने व्क्तव्य के साथ हर दिशा में संप्रेशित हो रहे हो। जेएनयू में तुम्हारा भाषण तो उसी रात खत्म हो गया था, लेकिन वो आज भी हर जगह चल रहा है। 



तुम इन कंधों पर बैठे हुए खुद महसूस कर रहे होगे कि यह कंधे कितने गुदगुदे और लचकीले हैं। इन पर बैठ कर तुम्हे महसूस हो रहा होगा कि तुम्हारा कद कुछ फीट बढ़ गया है, वहां से तुम्हारी सोच का कद भी सभी देख पा रहे हैं। ध्यान रखना जब तुम्हारा कद वहां बैठे-बैठे बढ़ने लगेगा तो इन कंधों को तुम बोझल लगने लगोगे। तुम्हारी सोच का वज़न, इन्हें तुम्हारे शरीर के वज़न से भी भारी लगने लगेगा। तब तुम्हारा नायकत्व इन कंधों में कीलों की मानिद चुभने लगेगा। वैसे भी यह कंधे किसी की सोच का बोझ ज़्यादा देर उठाने के आदि नहीं हैं। मैं नहीं कहता कि तुम यह सब समझते नहीं होगे, खूब समझते होगे। देखना अपना संतुलन हाथों में थामे रखना, कंधों पर बैठे-बैठे भी पांव ज़मीन पर जमाए रखना। हर सोच की रबड़ी एक हांडी में पकाने की तुम्हारी सोच है, उसकी रेसिपी संभाल के रखना। केवल कटोरियों के रंगों में उलझे मत रह जाना, जिस देश को तुमने थाली में देखा है, उसमें दो नहीं अनेक रंग हैं। यह थाली हर रंग की कटोरी को परख चुकी है, यह थाली अब तक के हर नायक का रंग ऐसिड टेस्ट में से गुज़ार के देख चुकी है। अब वह तुम पर नज़रें लगाए बैठी है, वो यह भी देखेगी कि तुम अपना रंग कैसे दिखाओगे। यह भी देखेगी कि जिस-जिस रंग के कंधों पर तुम बैठे हो, वह कंधे कब तक कंधे बने रहेंगे। अचानक से तुम पर भारी जिम्मेदारी आन पड़ी है, तुम्हारे लिए पार्टी तैय होने लगी है। तुम्हारे पद पर विचार चल रहा है। याद रखना, यह वह चक्रव्यूह है जिस में बहुत से अभिमन्यु दाखिल हुए और अधिकतर बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ नहीं पाए, जो कुछ निकल पाएं हैं, वह दाखिल तो अभिमन्यू ही हुए थे, लेकिन बाहर आते-आते वह धृतराष्ट्र हो जाते रहे हैं। बस आखिर में एक ही बात कहेंगे, अकेले आए थे, अंत में कुरूक्षेत्र अकेले ही लड़ना होगा, हर युग में कृष्ण सार्थी बन कर नहीं आते, वैसे भी तुम खुद कन्हैया हो, दोनो कर्म तुम्हें खुद ही फलीभूत करने होंगे, बाकी सैना तो सेनापति के हौंसले से ही खड़ी रहती है रणभूमि में! जय हो!

भवदीय
कटोरि‍यों तले घि‍स चुकी थाली का एक रंग
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परि‍कल्पना-दीप जगदीप सि‍ंह
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