Film Review | उड़ता पंजाब

बस कर टो... टो... टाॅमी सिंह

-दीप जगदीप सिंह-
रे​टिंग 3/5

उड़ता पंजाब एक शानदान फिल्म तो नहीं है लेकिन जानदार फिल्म ज़रूर है, वो भी अपने जानदार किरदारों की वजह से। फिल्म में एक समुचित कहानी ना होने की वजह से यह केवल किरदारों की आंतरिक और बाहरी उथल-पुथल को पर्दे पर उतारती हुई बताती है कि कैसे नशा इन किरदारों की ज़िंदगी को एक अंधे कुएं की ओर धकेल रहा है।
 
जिस राजनैतिक उठापटक ने फिल्म को विवादित बना दिया था फिल्म का उससे दूर-दूर तक कोई नाता है। अगर कहूं कि फिल्म रत्ती भर भी राजनैतिक नहीं है तो गल्त नहीं होगा।
फिल्म चार किरदारों टाॅमी सिंह (शाहिद कपूर ) , सरताज (दिलजीत दोसांझ) , पिंकी कुमारी (आलिया भट्ट) और डाॅ. प्रीत साहनी (करीना कपूर) के गिर्द घूमती है। टाॅमी पंजाब के एक चर्चित राॅकस्टार से पूरी तरह मेल खाता राॅकस्टार है, जो नशे की में धुन इत्तेफाक से कुछ ऐसी धुनें बना गया है जिस पर सारी दुनिया नाचती है। यह बीते की बात है, अब हालत यह है कि नशे की लत्त और उसकी धुन में ऊल-जलूल हरकतों की वजह से वह नकारा हो चुका है, प्रड्यूसर उससे कन्नी कतराने लगे हैं। उसके रसातल में जाने का सफर यहीं पर नहीं रूकता बल्कि ड्रग्स के जुर्म में पुलिस उसे अंदर कर देती है।
सरताज एक मामूली पुलिस इंस्पैक्टर है जो नशा-तस्करी के लंबे चैढ़े मैकनिज़्म में केवल एक छोटे से पुर्जे की तरह है, जो नशे के ट्रक सुरिक्षत निकालने के एवज़ में मिलने वाली रिश्वत ना बढ़ने को लेकर चिंतित रहता है। उस दिन तक जिस दिन उसका किशोर भाई खुद मेडिकल नशे की ओवरडोज़ लेकर मौत के बेहद करीब नहीं पहुंच जाता। तभी उसकी मुलाकात होती है डाॅ. प्रीत साहनी से जो ना सिर्फ नशा मुक्ति केंद्र चलाती है बल्कि अपनी एनजीओ के ज़रिए पंजाब में फैले हुए नशे के कारोबार को उजागर करने के लिए लड़ रही है। छोटे भाई की दुखदायी हालत और प्रीत के उलहाने सरताज के अंदर का पंजाबी गभरू जगा देता है और वह प्रीत के साथ मिल कर नशे के कारोबार का अमेघ किला ध्वस्त करने के लिए निकल पड़ते हैं।

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नशे का कारोबार सरहद पार पाकिस्तान से लेकर पंजाब की हर गली में खुली दवा की दुकानों तक फैला हुआ है। पाकिस्तान की तरफ से तस्कर हिंदुस्तान सरहद में स्थित खेतों में हैरोईन के पैकेट फेंकते हैं जिसे इधर का कारिंदा क्षेत्रिय तस्कर तक पहुंचा देता है जहां से नशे की पुड़ियां करोड़ों रूपए के मुनाफे के साथ पंजाब के कोने कोने तक पहुंच जाती हैं। एक रात ऐसा ही एक पैकेट सरहदी खेत में मजदूरी करने वाली बिहार की हाकी खिलाड़ी पिंकी कुमारी को मिल जाता है, जिसे वह चुरा लेती है। उसे लगता है कि तीन किलो हैराईन का यह पैकेट उसकी ज़िंदगी बदल देगा। उसकी ज़िंदगी बदलती है तो है लेकिन सुधरने की बजाए नर्क बन जाती है, क्योंकि हैरोईन का पैकेट बेचने के लिए वह उसी तस्कर के पास पहुंच जाती है जिसके लिए यह फैंका गया होता है। वह ना सिर्फ उसका शौषण करते हैं बल्कि उसे नशे की लत भी लगा देते हैं, कई बार कोशिश करने के बावजूद वह भाग नहीं पाती, लेकिन एक रात उसे भागने का मौका मिल ही जाता है।

अपने डूबते पाॅप करियर को बचाने की आख़री कोशिश में टाॅमी सिंह आख़री शो करता है, जहां पर वह अपने चिरपरित नशे को प्रचारित करने वाले गीत गाने की बजाए नशे की वजह से हुई उसकी हालत और अपनी सच्चाई का 'भाषण' देने लगता है। भीड़ चिढ़ कर उस पर हमला बोल देती है। वहां से जान बचाने के लिए भागा टाॅमी सिंह रात के अंधेरे में भागी जा रही पिंकी कुमारी से टकरा जाता है। ज़िंदगी से पूरी तरह से टूट चुका सूपर स्टार टाॅमी सिंह हौसला छोड़ चुका है तो बुरी तरह से प्रताड़ना झेलने के बावजूद एक मामूली मज़दूर पिंकी अब भी ज़िंदगी नए सिरे से शुरू करने के लिए तैयार है। यह बात टाॅमी सिंह को अंदर से हिला देती है और वह पिंकी की तलाश के बहाने अपनी असली ज़िंदगी की तलाश के सफर पर निकल जाता है।


क्या टाॅमी सिंह की तलाश पूरी होगी? क्या सरताज अपने मासूम भाई की ज़िंदगी बचा सकेगा? क्या वह प्रीती के साथ मिल कर अपने भाई जैसे अनेक नौजवानों को नशे की दलदल में धकेलने वाले नशे के सौदागरों का पर्दाफाश कर सकेंगे? क्या नशे के अमेघ किले के शंहनशाह तक वह पहुंच सकेंगे? यह कुछ सवाल हैं जिन को लेकर यह किरदार उड़ता पंजाब के साथ उड़ान भरने की कोशिश कर रहे हैं। इसके साथ-साथ कैसे नशा सरहद पार से लेकर आम दवा की दुकानों तक अल्हड़ उम्र के युवाओं से लेकर अधेड़ों तक कितनी आसानी से पहुंच रहा है यह दिखानी की कोशिश की गई है।

जैसा कि शुरूआत में बताया कि फिल्म में कहानी की बजाए सिर्फ किरदार हैं। सबसे दमदार किरदार है टाॅमी सिंह और पिंकी कुमारी। शाहिद कपूर ने पूरे दम से असल जीवन के राॅकस्टार से मेल खाने वाले इस किरदार को बख़ूबी निभाया है। हर दर्शक बेहद आसानी से दोनों को रिलेट कर पाते हैं। नाक से लकीर खींचने से लेकर, स्टेज पर परफार्मेंस, बेबसी, नशा करने या ना करने का द्वंद और सच्चाई को महसूस करने के हर दृश्य को शाहिद जीते हुए नज़र आए हैं। पंजाबी में बोले गए उनके संवाद भी नेचुरल लगते हैं। बिहारी मजदूर के किरदार में आलिया भट्ट विस्मित करती हैं। हाईवे के बाद एक बार फिर वह एक नाॅन-ग्लैमर्स किरदार में दिखी हैं, जिसे उन्होंने पूरा आत्मसात किया है। हालांकि उनका बिहारी लहजा कहीं ना कहीं झोल खा जाता है, लेकिन शुरू से लेकर अंत तक वह अपने किरदार को पकड़े रखती हैं। दिलजीत दोसांझ और करीना कपूर दोनों को ही आसान किरदार मिले हैं, जिसे दोनों आसानी से निभा जाते हैं। पंजाबी सिनेमा में अपने चुलबुले अंदाज़ से गहरी छाप छोड़ चुके दिलजीत हिंदी सिनेमा में एक गंभीर किरदार के साथ उतरे हैं। उनके फैन्स उनकी शख़्सीयत का यह रूप देख कर हैरान और खुश होंगे। किरदार के हिसाब से पर्दे पर वह किरदार मे नज़र भी आते हैं। उनका हिंदी लहजा भी ठीक-ठाक है। करीना कपूर का किरदार सबसे कमज़ोर था और करने के लिए उनके पास ज़्यादा कुछ नहीं था, लेकिन फिर भी जितना उनके हिस्सा आया वह उसे ठीक-ठाक निभा गई हैं और कुछ एक पंजाबी संवाद भी बेहद प्रभावशाली तरीके से बोल गई हैं। बल्ली का किरदार निभा रहे बच्चे और पुलिस अफसर के रूप में मानव विज का ज़िक्र करना भी बनता है।

उड़ता पंजाब एक आम मसाला फिल्म नहीं है बल्कि एक डार्क रियल्टी बेस्ड फिल्म है जो कुछ दर्दनाक सच्चाईयों से रूबरू करवाने की कोशिश करती है। फिल्म दमदार शुरूआत के बाद धीरे-धीरे ढीली होनी शुरू हो जाती है। अभिषेक चैबे ने किरदारों को जितना फैलाया है उसे पटकथा में बांधे रखना उतना ही मुश्किल है, लेकिन काफी हद तक वह इसमें सफल रहे हैं। दृश्य इस तरह से बदलते हैं कि उनसे लगातार जुड़े रहने के लिए दर्शक को काफी ध्यान देना पड़ता है। दूसरे हिस्से में आकर फिल्म कई जगह पर बेहद ढीली हो जाती है, लेकिन शाहिद और आल्या के आपसी संवाद के दृश्य बेहद प्रभावशाली बन पड़े हैं। एडिटिंग अगर थोड़ी चुस्त होती तो फिल्म में कसाव आ सकता था। अमित त्रिवेदी का गीत-संगीत किरदारों की प्रस्थितियों को उभारने में मदद करता है, वहीं बैकग्राउंड स्कोर फिल्म का माहौल सटीक बनाए रखता है। सिनेमेटोग्राफी एक्स्ट्रा आॅडनेरी तो नहीं है लेकिन जिस तरह का माहौल किरदारों के लिए आवश्यक था, उसे सफलता से उतारती है। कुछ एक फ्रेम बेहद प्रभावशाली बने हैं।

कुछ अहम बातें
फिल्म के कुछ संवाद और दृश्य पंजाबी की मानसिकता को बेहद गहरे तरीके से पेश करते हैं- करीना का संवाद “साड्डे ठीक आ दुजेयां दे खराब है” बताता है कि कैसे पंजाब का हर बड़ा-बुर्ज़ुग यह मानता है कि उसका बच्चा नशा नहीं करता, दूसरों के करते हैं। जबकि कई बार सच्चाई बहुत भयावह निकली है।

दिलजीत का संवाद “मुंडे तां टीके ला के टाईट होए पए ने हुण लेडीज़ नू ही कुछ करना पएगा” नशे को घर की जड़ों तक पहुंचने से रोकने के लिए महिलाओं की भूमिका को बहुत गहराई से बयान करता है।

पंजाब के चुनावों के मद्देनज़र राजनैतिक माहौल में उड़ता पंजाब से जिस तरह ज़मीन हिला देनी वाली हकीकत बयान करने की उम्मीदें लगाई जा रही थी, वैसा इस फिल्म में कुछ नहीं है।

फिल्म में नशे के कारोबार में संलिप्त एक काल्पनिक एमएलए के किरदार और उसके ड्राईवर के नाम पर चलाई जा रही फर्ज़ी दवा कंपनी से बहुत ही अप्रत्यक्ष रूप से कुछ सांकेतिक इशारे करने की कोशिश की गई है, लेकिन साथ ही यह कह कर कि और कितने नेता इसमें शामिल हैं और अंत में नेता का बयान दिखा कर कि मुझे और मेरे परिवार को शामिल ना किया जाए, फिल्म उस न्यूज़ चैनल की बहस जैसी बन जाती है, जिसमें शोर तो बहुत होता है लेकिन दर्शक के पल्ले कुछ नहीं पड़ता। फिल्म देखने के बाद पंजाब से जुड़ा दर्शक इस मामले में निराशा ही महसूस करता है।

जैसा कि चर्चा थी कि इस फिल्म से पंजाब की मौजूदा सरकार को खतरा है इस लिए फिल्म रूकवाने की कोशिश की जा रही है तो फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जो पूरी दुनिया पहले से नहीं जानती। यह फिल्म केवल पिछले दस साल की अख़बारों की सुर्खियों का रिप्तोर्ज भर है। पंजाब सरकार को इस फिल्म से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। ना ही विरोधी पार्टियां इसका कोई फायदा उठा पाएंगी।

फिल्म में हर प्रमुख किरदार जिसमें छोटे बच्चे से लेकर उम्रदराज़ लोगों को नशा करते हुए दिखाया गया है, जिससे आभास होता है कि हर कोई नशेड़ी ही है।



फिल्म का गीत चिट्टा वे हैरोईन के नशे को बड़े स्तर पर किसी अमृत की तरह खुले तौर पर प्रमोट करता है और किरदारों की त्रासदी के ज़रिए बहुत ही धीमे सुर में नशे से दूर रहने का संदेश देता है। करीना का आख़री डायलाॅग नशे के पीड़ितो के परिवारों के लिए अह्म नसीहत हो सकता है, “वो जीतेंगे तो हम जीतेंगे, वो हारेंगे तो हम हारेंगे।”

फिल्म का सबसे दमदार दृश्य है जब टाॅमी सिंह जेल में दो युवा लड़कों से मिलता है जो उसके फैन है और उसके गीतों से प्रभावित होकर नशे के आदि हो गए। इतने आदि के जब उन्हें मां ने पैसे देने से इंकार कर दिया तो उन्होंने मां का ही कत्ल कर दिया। यह दृश्य पंजाबी संगीत और कलाकारों के युवाओं की मानसिकता पर गहरे प्रभाव को बहुत मार्मिकता से पेश करता है।

नशे और सियासी असमंजस के माहौल से त्रस्त पंजाब दर्शक फिल्म में दी गई बेहूदा, अंतहीन और ज़ब्रदस्ती ठूंसी हुई गालियों की वजह से इस फिल्म से खुद को रिलेट करना बिल्कुल पसंद नहीं करेगा। ना ही वह इस फिल्म को परिवार के साथ देखने जाएगा। जिस वजह से नशे के मामले में टीएज युवाओं और पेरेंट्स के बीच जिस कड़ी का यह फिल्म कर सकती थी, वह नहीं कर पाएगी।
सेंसर बोर्ड के बहाने जितना विवाद खड़ा किया गया फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है।
फैसला
अगर आप कमज़ोर दिल के हैं और स्टीरियोटाईप एंटरटेनमेंट सिनेमा ही आपको सिनेमा लगता है तो यह फिल्म आपके लिए नहीं है। इस फिल्म के दमदार किरदारों के लिए इसे 3 स्टार...
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