पंजाबी कहानी | लबारी | जतिंदर सिंह हांस

आज के दौर की सबसे बड़ी त्रासदी कोई बीमारी नहीं बल्कि अकेलापन है, जो यूवा पीढ़ी से लेकर उम्रदराज़ पीढ़ी को अंदर ही अंदर खाए जा रहा है। यूवा पंजाबी कथाकार जतिंदर सिंह हांस अपनी पंजाबी कहानी लूतरो में दो पीढ़ियों के अकेलेपन को अपनी दो महिला पात्रों के ज़रिए बाखूबी पेश कर रहें हैं। सोशल मीडिया के दौर में हर पल पूरी दुनिया से जुड़ा रहने वाला आज का मानव असल में कितना अकेला है, इस कहानी के ज़रिए यह मर्म देखा जा सकता है। प्रस्तुत है लूतरो का हिंदी अनुवाद लबारी-

मन करता है कमज़ात को चोटी पकड़ घर से निकाल दूं। हाथ भर की ज़बान, कैंची की तरह चलती है, इसे मैं लबारी कहती हूं।
 
ब्लड-प्रैशर बढ़ा हो तो बहुत कुछ कह देती हूं, चिकने घड़े जैसी है, कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता। बस हंसती रहती है। कई बार तो मेरा ब्लड प्रैशर इस बात से बढ़ जाता है कि गधे की बच्ची को इतनी हंसी आती कहां से है! फिर मुझे गोली खानी पड़ती है। 
कलमुंही कल नहीं आई। कल से गुस्सा चढ़ा है। पता नहीं किस कल्मुंहे के साथ निकली होगी? जब भी आती है एक छैल-छबीला लड़का हमारे दरवाज़े के सामने चक्कर काटता है। एक दिन मैंने पूछा, “री, मुक्को! यह बेशर्म किनका लड़का है?” होंठ बिचकाती हुई बोली, “कौन जाने बीबी, बहुत हैं फालतू घूमने वाले।” हरामख़ोर के ऐसे लक्ष्ण हैं तभी मायके बैठी है, दो बेटियां भी ले आई। मैंने भी बाल धूप में सफैद नहीं किए। जब इसने कहा कि उस छैल-छबीले को नहीं जानती, तभी समझ गई थी कि इसी ने पीछे लगा रखा है।
जिस दिन इसे काम पर रखा, मैंने कहा था, “बिस्तर से नहीं उठ सकती मैं, एक दिन की छुट्टी करोगी तो सप्ताह भर की तनख्वाह काट लूंगी।” कहा इसलिए कि छुट्टी ना करे।
“कसम से मैं छुट्टी नहीं करती। त्योहार पर भी नहीं। कल इंतज़ार करते हुए मेरी आंखें पक गई। गधे की बच्ची आई ही नहीं। ना ही परसों बता कर गई कि कल नहीं आएगी। पता भी है उसे कि मैं बिस्तर से उठ नहीं सकती। 
मन था कि किसी और को रख लूं, लेकिन सब का यही हाल है। कोई कुलच्छनी मुझसे परेशान होकर भाग जाती है। किसी का काम मुझे पसंद नहीं आता और किसी ऐरे गैरे को घर में भी नहीं घुसा सकते। आजकल सौ रूपए के पीछे कत्ल हो जाते हैं।

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औरत चाहे बूढ़ी हो जाए, मुश्किल में मायके की ओर ही देखती है। भाभी कई-कई दिन के लिए आ जाती है। मेरा गुस्सा भी सहन कर लेती है। लेकिन कल इधर मुक्को नहीं आई, उधर भाभी भी मायके गई हुई थी। वैसे मेरे बेटे लक्की को मेरी फिक्र रहती है, पर ना जाने कैसी हवा चली है। पहले रिश्तेदारों के यहां कई दिन रह कर आते थे। अब तो किसी के पास फ़ुर्सत नहीं। दुनिया पैसे के पीछे कुत्ते की तरह दौड़ रही है। मुझसे भी कहीं जाकर रहा नहीं जाता। मन ही नहीं लगता।
अकेली होती हूं तो घबराहट होने लगती है। दर्द होने लगता है, ब्लड प्रैशर बढ़ जाता है, दिल कच्चा होने लगता है, डर सी जाती हूं। लगता है बचूंगी नहीं। मरते समय कोई पास ना हुआ सोच कर ज़्यादा घबरा जाती हूं। क्या पता मेरी लाश कुत्ते नोच खाएं।


लक्की आॅस्ट्रेलिया से फ़ोन पर कहेगा, “मम्मी तुम प्यार से काम करवाया करो।”
मैंने कहा, “हां, मैं ही बुरी हूं। मेरी कड़वी ज़बान ही गंदी है। जब अपना जना मुझे छोड़ प्रदेस चला गया तो बेगानों से क्या उम्मीद!” 
लक्की पत्नी की हर बात मानता है। एक बार मैंने गुस्से मे कहा, “मुझे मम्मी-मम्मी मत कहा कर, बेटा तो तू अपनी औरत का है। उसने कहा तो विदेश चला गया। यहां क्या कमी थी, सब था भगवान का दिया।”
जैसे पत्नी ने गला दबोच रखा हो मरियल आवाज़ में कहने लगा, “मम्मी, था तो सब कुछ, लेकिन इंडिया में बच्चे सैट नहीं हो पाते।”
मैने कहा, “बेटे, याद रखना, तू अपने बच्चों को सैट करने के लिए मुझे छोड़ गया, तेरे बच्चे अपने बच्चों को सैट करने के लिए तुझे छोड़ जाएंगे।”
मिमियाने लगा तो सोचा रे मन तू कष्ट काट रहा है। उसे क्यूं बददुआ देता है। बहू भी मेरे स्वभाव के डर से ही उसे लेकर भागी थी।
सरदार जी जीवित थे तो घर भरा-भरा था। वह छोड़ कर चले गए। लक्की बीवी-बच्चों के साथ आॅस्ट्रेलिया भाग गया। खाली घर का सन्नाटा काटता है।
बीमारी से ज़्यादा अकेलापन मुझे मार रहा है। जब से बिस्तर पर पड़ी हूं, पड़ोसी भी नहीं आते। पहले दुख-सुख में आना जाना लगा रहता था। ज़माने को ना जाने कौन सी हवा लग गई, कोई मोह नहीं, प्रेम नहीं। मुझ से सच बोला जाता है, सब को कड़वा लगता है।
सच कहूं जब लबारी आ जाए तो मेरा मन लग जाता है। पूरे गांव की ख़बर बता देती है, हरामज़ादी...!
मुक्को हंसती हुई अंदर आई। इतनी भी शर्म नहीं कि कल आई नहीं थी, बीबी गुस्से में होगी।
सोचती हूं, इस भूखी-नंगी को हंसी किस बात की आती रहती है। मेरे पास तो सब कुछ है लेकिन हंसे हुई सदियां बीत गईं।


“माथा टेकती हूं बीबी”, कहा तो मेरे मुंह से आशीष निकली, “सुखी बसो, मेरे लक्की, गर्म हवाओं से बचे रहो!” पड़ौसी भी इसी लिए नाराज़ रहते हैं कोई पांव छुए मुंह से आशीष अपने बेटे के लिए ही निकलती है। लेकिन क्या करूं मेरे मुंह से गालियां तो ख़ूब निकल जाती हैं, आशीष नहीं दी जाती। मुक्को को तो सुहागन होने की आशीष भी नहीं दे सकती, छुट्टड़ को। 
मैले कपड़े उठाते हुए बोली, “आज क्या देखा भैंस ने बछड़ा जना ही था कि बछड़े को टोकरे में बांध कर साईकिल पर रखा और भैंस की ज़ंजीर खोल दी। वैसे तो बड़ी मुश्किल से मवेशी घर छोड़ते हैं, लेकिन व्यापारी साईकिल लेकर आगे चलता रहा और भैंस उसके पीछे भागती जाए। कितना मोह होता है मां का बच्चे के लिए।”
कुछ दिन पहले मेरा पती भी मेरी बेटियों को स्कूल से लेकर जाने लगा। मास्टर ने मुझे बताया तो मैंने पुलिस की धमकी देकर रोका उसे। सोचता है बच्चियों के मोह में उसके पास लौट जाऊंगी। उस नर्क में कभी ना लौटूं। कह कर हंसने लगी। ना जाने इसमें हंसने की क्या बात है। वह मशीन में कपड़े धोने लगी और बातें भी करती गई।
लक्की और बहू फ़ोन पर कहते हैं, “मुक्को बहुत दिल लगाए रखती है। काम भी साफ़ करती है। इसे हटाना मत।”
उन्हें पता है अकेलेपन ने मुझे निढाल कर दिया है। मैंने कहा, “हां बेटा अब तो बेगानो से ही मन लगाना है, अपने तो सात समंदर पार हैं।”
मन किया लबारी को बुला कर खरी खोटी सुनायूं, लेकिन भाग ना जाए इस डर से चुप रही।
घुटनों का आॅप्रेशन होने वाला है इसकी ज़रूरत है। सोचा था लक्की आएगा, आधा रोग तो यूं ही दूर हो जाएगा। लेकिन जोरू का गुलाम दो लाख रूपए भेज कर कहने लगा कि ख़ुद आया तो एक साल पिछड़ जाऊंगा, कर्ज़ नहीं उतार पाऊंगा। नौकरी चली जाएगी। 
क्या फ़ायदा प्रदेस जाने का। वही रोना-धोना। 
जब यह जन्मा था तो इसे मोल खरीदा था। मेरे बच्चे बचते नहीं थे। झाड़ी वाले संत ने उपाय बताया बच्चा होते ही गरीब को दान करना। यह हुआ तो मेरी सास ने इसे गरीब औरत की झोली में डाल दिया। लेकिन जैसे ही उसने दहलीज़ पार की तो मैं अपने पती के साथ उसके पीछे दौड़ पड़ी। बेटा वापिस मांगा तो उसने मुंह मांगा गुड़, आटा, सूट, रूपए लेकर बच्चा वापिस किया। 
सोचती हूं घुटनों के ईलाज से क्या होगा। दो लाख बदशक्ल बहू के मुंह पर मार कर अपना बेटा वापिस मांग लूं।
कपड़े सुखाते हुए भी मुक्को हंस रही है। क्यों हंस रही है यह कलमुंही।
पैदा होते ही इसके गुस्सैल बाप ने इसे अपनी बेटी मानने से इंकार कर दिया। वह अपनी बेटी को मार देना चाहता था। लेकिन जैसे जैसे बड़ी होती गई तो मोह बढ़ता गया। इकलौती बेटी है। अब कहता है मेरी बेटी बहुत अच्छी है। घर का खर्च चलाती है। इसका कर्ज़ नहीं उतार सकता।
लोगों को पता चल जाता है बच्चा कैसा होगा। मां-बाप को तो तब ही पता चलता है जब वह कोर्ट मैरिज कर लेते हैं।
मुक्को किस मिट्टी की बनी है। तड़के बेटियों को तैयार कर स्कूल छोड़, पूरे परिवार का ख़ाना बना, फिर लोगों के घर काम करना। बिल्कुल थकती नहीं। 
एक दिन मैंने पूछा, “तुझे अपना घरवाला याद नहीं आता?”
कहने लगी, “वह नशेड़ी मुझे मिट्टी का तेल डाल कर जला देने वाला था, माचिस नहीं मिली, लोगों ने बचा लिया। एक दिन गला दबाने लगा, सास ने जान बचाई। उसे भी यही परेशानी थी कि हंसती क्यूं रहती हूं। लोग शक करते हैं। शक्की हरामी ख़ुद था। शक बहुत बुरी बीमारी है। ज़िदंगी बर्बाद कर देती है। शक करने से बेहतर विश्वास करके धोखा खा लेना है।”
“तलाक लेकर दूसरी शादी करवा ले।”
“ना ना, बेटियों को पढ़ा लिखा कर पैरों पर खड़ा करना है। बाप का कैंसर का इलाज बीकानेर से चल रहा है। मां-बाप की सेवा करनी है। उनका मेरे सिवा कौन है।”
जाने लगी तो मैंने पूछा “कलमुंही कल क्यूं नहीं आई?” मुझे फिर गुस्सा आ गया।
“कल झगड़ा हो गया था।”
“किसके साथ, मरजाणिए?”
“मेरा नहीं, पड़ोसनों का।”
“तू सरपंच लगी है, तूने क्यूं छुट्टी की?”
“झगड़ा देखना था। जब आपस में गाली देती हैं तो पता चलता है, किसका चक्कर किसके साथ चल रहा है।” वह हंसने लगी।
“सप्ताह भर की तनख़्वाह काटूूंगी।”
“ना बीबी, ऐसा मत करना, मैं तो त्योहार पर भी छुट्टी नहीं करती।”
“अगर पड़ौसने फिर से लड़ पड़ी तो?”
“फिर तो छुट्टी करनी ही पड़ेगी। चाहो तो पूरे महीने की तनख़्वाह काट लेना। लड़ाई तो मैं देखूंगी ही।” हंसती हुई घर से बाहर चली गई।
“बेड़ा गर्क हो इसका”, कहते हुए मेरी भी हंसी छूट गई।

-जतिंदर सिंह हांस
यूवा कथकारों में प्रमुख हस्ताक्षर
अनुवाद - दीप जगदीप सिंह
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