पंजाबी कहानी | चक दे इंडिया | बलदेव सिंह

1990 के बाद की खुली अर्थव्यवस्था के बाद देश ने जैसे ख़ुद को इंडिया और भारत में बंटते देखता है, उसे हम अनदेखा तो कर सकते हैं नज़रअंदाज़ नहीं। इंडिया में रहते हुए बीएमडब्लयू में किसी हीरोईन की कमर सी बल खाती सड़क पर जब हम किसी चैराहे पर रूकते हैं तो ना चाहते हुए भी भारत हाथ फैलाए हमारे सामने आ खड़ा होता है। इंडिया की चकाचैंध में पनप रहा यह भारत असल में कैसे अपनी ज़िंदगी जीता है, सड़कनामा के लिए चर्चित पंजाबी कथाकार बलदेव सिंह अपनी कहानी 'मैं हँस ना सका' में इस अंतरद्वंद को बाखूबी पेश करते हैं। इस कहानी का हिंदी अनुवाद 'चक दे इंडिया' आॅनलाईन पाठकों के लिए प्रस्तुत है-
मुहल्ले की ख़ाली जगहों पर, वह परिवार देखते-देखते छे-सात जगह बदल चुका था। सबसे पहले उन्हें मैंने अपने घर के पिछवाड़े, खाली प्लाट में देखा।
 
दो ही दिन में उन्होंने अपनी झुग्गी बना ली। आसपास से ईंट पत्थर जुटा कर चूल्हा जलाने के लिए ओट बना ली। उनके दो बच्चे थे, बड़ा दो साल का, छोटा साल भर का लगता था। औरत फिर से गर्भवति थी।
साल भर वह घर के पिछवाड़े रहे। नंगे धड़, नंग पैरों वाले बच्चे लोगों द्वारा फेंकी गई बेकार चीज़ों से खेलते रहते। ना उन्हें गर्मी ने परेशान किया, न ही वह सर्दी में बीमार हुए। 
सूखी हड्डियों, गहरे रंग का मर्द जब भी दिखता, उसने शराब पी रखी होती। पत्नी को लक्खी कह कर आवाज़ देता। कभी-कभार कुतिया और हरामज़ादी भी बोलता। मुझे शक था कि उसकी बीवी भी उसके साथ शराब पीती थी। मैं उन्हें अक्सर चुहलबाज़ी करते हुए देखता और हैरान हो जाता, ना सिर पर ढंग की छत, ना तन पर पूरे कपड़े, ना ही शायद खाने को होगा, फिर भी इतनी बेफिक्री, इतनी मस्ती, इतनी फ़कीरी? हम लोग तो दिन भर चक्कर में ही पड़े रहते हैं। कभी ब्लड प्रैशर, कभी शूगर। सर्दी में निमोनिया का डर तो गर्मी में हीट स्ट्रोक हो जाता। छोटी सी घर-गृहस्थी ही नहीं संभलती। इन्हें किसी चीज़ की कोई परवाह ही नहीं।
औरत ने यहां झुग्गी में ही एक लड़की को जन्म दिया। मुहल्ले की औरतें ख़बर निकाल लाईं। फिर तबसरा होने लगा- ‘हैरानी की बात है, ना दाई, ना हस्पताल, अकेली ने ही लडक़ी जन दी। 
तड़के बेटी को जन्म दिया, शाम को, मैंने लक्खी को चूल्हा जलाते देखा। नवजात बच्ची, उसने अपने पास, एक फटे से कंबल पर लेटा रखी थी।
सोचने लगा, हमारे घर की औरतें सवा महीने कमरे से बाहर ही नहीं आतीं। पलंग से नहीं उतरती। पंजीरी और ना जाने क्या-क्या खिलाना पड़ता है। मालिश करने के लिए मां और दाईयां हाथ-पावं पकड़े रहती हैं। यह सुबह लड़की जन कर शाम को चूल्हा जलाए बैठी है।

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उस प्लाट में मकान बनना शुरू हुआ तो वह परिवार दूसरी ख़ाली जगह जा बैठा। आते-जाते कभी-कभार उन पर नज़र चली जाती। ना लक्खी नज़र आती, ना ही उसका मर्द। तीन बच्चे खेलते हुए नज़र आते। शुरूआत में लड़के छोटी लड़की को इधर-उधर खींचते रहते। वह रोती चीखती, बच्चों को कोई फिक्र ना होती। कुछ दिनों बाद लड़की खेलते हुए लड़कों के पीछे रेंगती हुई नज़र आई। फिर चलने लगी। काफ़ी दिनों बाद लक्खी नज़र आई, फिर से गर्भवति।
फिर वह रेलवे फाटक के पास जा बैठे। अब लक्खी के पास एक और छोटा बच्चा था। ना उनकी झुग्गी बड़ी हुई, ना उन्होंने पहले से ज़्यादा जगह ली, लेकिन परिवार के सदस्य छह हो गए। औरत की सेहत भी वैसी की वैसी, जिसे हम कहते हैं ना सावन में हरे, ना आषाड़ में सूखे।


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कुछ साल बाद मैं सब कुछ भूल चुका था। भैसों के बाड़े वाले एक दोस्त से मिलने गया तो देख कर हैरान रह गया। बाड़े के साथ खाली जगह पर लक्खी अपनी झुग्गी के बाहर बैठी थी। आसपास छह बच्चे खेल रहे थे। सर्दी का मौसम, ठंडी हवा चल रही थी। कपड़ों में भी कंपकंपी छूटती थी, लेकिन सब बच्चे नंग-धडंग। 
‘तू जानता है इनको?’ दोस्त ने मेरी और अचंभे से देखते हुए पूछा।
‘ज़्यादा नहीं, लेकिन इन्हें एक से दूसरी जगह उजड़ते देखा है। यह सभी बच्चे इसके हैं क्या?’ मैंने पूछा।
‘इसी के हैं। बेग़ैरत हर साल जन देती है। आठ हैं, छह तो यह रहे। दो बड़े आसपास कहीं शह लगा कर बैठे होंगे। एक और होने वाला है।’ दोस्त हंसने लगा।
‘मैंने इसे जब भी देखा, गर्भवति ही देखा।’ मैंने बताया
‘जम कर दारू पीती है। फिर हुंकार भरती है। इस मरियल की हिम्मत तो देख। हमारी वाली तो अच्छी-भली, खाती-पीती फैल जाती हैं। इसे तो कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता।’
‘यार, जब यह मेरे घर के पिछवाड़े रहते थे। तब दो बच्चे थे। तीसरी लड़की वहीं पैदा हुई। शक तो था मुझे कि दारू पीती है, लेकिन कभी देखा नहीं। वैसे उस कलमुंहे पति से छेड़खानी करने से बाज़ नहीं आती थी।’
‘देख ले फिर छेड़खानी का मज़ा, आठ बच्चे, नौवां पेट में है। दो महीने नहीं जाते, फिर से गाभिन हो जाती है। भैंसों की देखभाल करने वाला मेरा दोस्त, बोली भी भैंसों के व्यपारियों जैसी बोल रहा था। ना जाने खाती क्या है, बच्चे सारे कंक्रीट की ईंट जैसे हैं इसके। जैसे एक ही सांचे से निकाले हों। सब मां पर गए हैं। बड़ा आठ साल का होगा, फिर तो हर साल ब्याई गई है। बड़े दो तो अफलातून हैं। डरते बिल्कुल नहीं। तूने देखा नहीं, तेरे बस अड्डे वाले दफ़तर के पास ही तो दिन भर रहते हैं...?’


‘अच्छा...अच्छा...!’ मैंने याद करते हु कहा, ‘वो दोने जो एक जैसी चुन्नी आखों वाले, पिचके नाक वाले...?’
‘हां। सभी इसी के हैं। सुबह ही भगा देती है उन्हें घर से।’ बताते हुए मेरा दोस्त हंसने लगा।
उन बच्चों को मैंने बहुत बार देखा था। उनके साथ एक पांच साल की लड़की भी होती है। बिखरे बाल, जटाएं जैसे कभी नहाई ही ना हो। वह स्कूल या काॅलेज की लड़कियों के तो पीछे ही पड़ी रहती है। दूर तक उनका पीछा करेगी। परेशान होकर लड़कियां एक दो रूपए दे देती।
दूसरे बच्चे भी पूरा दिन बस अड्डे के बरामदे में कलाबाज़ियां लगाते। पता नहीं था कि यह पलटन लक्खी की है। दोस्त की बातें सुन कर मेरी सोच किसी भवंडर मे फंस गई। आठ बच्चे, फिर गर्भवति। ना कोई नौकरी, ना कारोबार। इतने बच्चों का पालन-पोषण, खाना-पीना, कपड़े। लेकिन मैंने उन बच्चों को जब भी देखा कमीज़ टख़नों तक लंबी। फटी-पुरानी घुटनों तक बनियान, जगह-जगह छेद वाली। एक पैर में चप्पल तो दूसरे में फीतों वाला जूता। कूड़े से उठाए होंगे। एक बच्चा गर्मी में ही उधड़ा सा स्वैटर पहने हुए देखा।
उनके बारे में सोच कर दुखी होता हूं। लेकिन अगले ही पल सोचता हूं, मुझे क्या। मैं क्यों इतना परेशान हो रहा हूं?
शनिवार का दिन था। भैंसों के बाड़े वाला दोस्त दफ़तर में मेरे पास बैठा था। ठंड की वजह से कुर्सियां बाहर धूप में रखी थीं। लक्खी के बच्चों की फौज को कटोरियां लिए पिछली गली से आते हुए देख, मेरा दोस्त कहने लगा-‘लो आ गया झुंड।’ 
‘आसपास कहीं लंगर लगा होगा।’ मैंने कहा।
‘कौन सा लंगर। हद करता है तू भी। आज शनिवार है। साले, शनि का तेल मांगने के लिए निकले हैं।’
‘लो अब भाटड़ा बिरादरी का धंधा भी छीन लिया।’ मैं हैरान हुआ।
‘और बड़े हो जाने दे, देखना, क्या-क्या छीनते हैं। मां गई होगी मांस की दुकान पर। वहां पर फेंकी गई बोटियां इक्ट्ठी करने। फिर उसे शनिवार के तेल से तड़का लगेगा।’
मैंने पूछा, ‘इनका बाप नहीं करता कुछ?’
‘तू नहीं जानता...?’ दोस्त मेरी कम जानकारी पर हंसा- ‘वह रात का शिकारी है। वर्कशापों में पहरा देता है। वहां से लोहा चोरी कर लेता है। वो जो आती हैं बड़े बोरे वाली लोहा बीनने, उनके साथ सैटिंग है। उनसे पैसे लेकर चोरी करवा देता है। फिर ठेका खुलने से पहले ही पहुंच जाता है। बच्चे भी बहुत तेज़ हैं, बाप को देखते ही इधर-उधर भाग लेते हैं। मां-बाप दोनों बैठ कर दारू पीते हैं। लड़ते हैं, एक दूसरे के साथ लोटते है और लक्खी, फिर गाभिन हो जाती है।’ दोस्त आखें मटकाते हुए शरारती हंसी हंसा।
वह हमारे पास शनि का दान मांगने आ गए। दोस्त ने उन्हें भगा दिया। मैं सोचने गला। क्या है इन बच्चें का भविष्य, ना स्कूल, ना कोई समझाने वाला। ना आने वाले कल की चिंता है। चिंता करने की उम्र भी नहीं इनकी। जिन्हें चिंता होनी चाहिए वह झुग्गी में शराब के नशे में डूबे होंगे। मैं सोचने लगा, इंसान को इतना संवेदनशीन नहीं होना चाहिए। इस दौर में जज़बाती मनुष्य का जीवन मुश्किल है। ढीठ बने रहो। जो होता है होने दो। लेकिन अगले ही पल सोचता हूं, क्यूं होने दो। यह सोच तो बस एक पक्ष को ही रास आती है। 
जब बड़ा छोटे के ऊपर बैठ कर उसे पीट रहा था तो दोस्त ने तंज़ कसते हुए कहा, ‘देख ले तेरा भारत महान।’
‘भारत महान की तो चीखें निकल रही हैं।’ मैंने हंसते हुए कहा।
तभी लक्खी आठ माह के बच्चे साथ आई और कुछ खाने के लिए मांगने लगी। ड्राईवर ने उसके बढ़े हुए पेट को ताड़ते हुए पूछा, ‘करता क्या है तेरा पति?’
लक्खी ने बेशर्मी से पेट पर हाथ फिराते हुए कहा, ‘बस यही करता है।’
पास खड़े लोग खिसियानी हंसी हंसे। ठरकी ड्राईवर उससे मज़े लेने लगा तो वह बद्दुआएं देती हुए बस अड्डे की तरफ़ चली गई।

***

दफ़तर में बैठा था, भैंसों के बाड़े वाला दोस्त भागता हुआ आया और कहने लगा, ‘जल्दी आ, तुझे तमाशा दिखायूं।’
खाना खाने निकल ही रहा था कि उसके साथ हो लिया। पिछली गली में पहुंचे तो देखा दस लोगों के बीचों बीच एक औरत सड़क पर लेटी है। पास जाकर लक्खी को देख हैरान रह गया। नशे में टुन्न। पास ही आठ माह की लड़की रो रही थी।
‘शेर की बच्ची, पूरा पव्वा सूखा ही गटक गई।’ भीड़ में खड़ा ड्राईवर बोला।
किसी और ने बताया, ‘इसका पती भी यहीं था, पव्वा वही लाया था, उसके छीनने से पहले इसने तो कर दिया चक्क दे इंडिया।’
लक्खी की आंख के नीचे सूजन थी, लेकिन नशे में झूमती हुई चिल्ला रही थी। आसपास खड़े सब हंस रहे थे। छोटी लड़की फटी हुई साड़ी में से झांक रही सूखी ख़ाली छातियां की ओर रेंग रही थी।
जब सभी लोग हंस रहे थे, तो मैं हंस नहीं पाया। अजीब उदासी मुझे पर हावी होने लगी। मुझे भीड़ में खड़े एक ड्राइवर की बात याद आई। सोचा, एक यह भी है हमारा चक दे इंडिया।
मैंने गहरी सांस ली और अपने दोस्त को भीड़ में ही छोड़ वहां से लौट आया।
-बलदेव सिंह
पंजाबी कथाकारी के प्रमुख हस्ताक्षर
अनुवाद -दीप जगदीप सिंह
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