Film Review | Hindi Medium | हिंदी मीडियम

अमीर और गरीब के बीच झूलते मध्यवर्ग का द्वंद

दीप जगदीप सिंह
कथा-पटकथा - साकेत चौधरी और ज़ीनत लखानी 
संवाद - अमितोश नागपाल

हिंदी मीडियम उस शुद्ध मध्यमवर्ग की फ़िल्म है जिसे गरीब से एलर्जी हो जाती है और अमीरों की नकल ना करे तो जुलाब लग जाते हैं, फिर अमीर दिखते-दिखते चाहे वह सड़क पर ही क्यों ना
 
आ जाए। लेकिन यह सिर्फ़ आर्थिक आधार पर वर्ग विभाजन की ही फ़िल्म नहीं है, यह भाषा और शैक्षिण ढांचे के विभाजन की भी फ़िल्म है जो आर्थिक वर्ग विभाजन की रेखा को ना सिर्फ़ और गहरा करता है, बल्कि बनाए रखने पर पूरी तरह से अमादा है। हिंदी मीडियम दोहरी मध्यवर्गीय मानसिकता पर चुटीला व्यंग्य तो करती है लेकिन ख़ुद ही अतिरेकता, रूढ़ीवाद और विरोधाभासों का शिकार भी हो जाती है। बावजूद इसके यह एक अर्थपूर्ण मनोरंजक फ़िल्म है।

राज बतरा (इरफ़ान ख़ान) दिल वालों की दिल्ली के दिल चांदनी चौक में कपड़ों का आलीशान शोरूम चलाता है जो कभी उसके पापा की दर्जी की दुकान हुआ करती थी। उसी दुकान पर चढ़ती जवानी के दिनों में उसकी मुहब्बत फैशनेबल मीता (सबा क़मर) के साथ परवान चढ़ती है। कुछ सालों बाद वह अपने अच्छे-ख़ासे कारोबार, ख़ूबसूरत रोमेंटिंक और डिमांडिंग पत्नी और तीन साल की बेटी पिया के साथ (दिशिता सहगल) के साथ नागिन सीरियल देखते हुए मौज से दिन काट रहा है। उसकी ज़िंदगी में तब उथल-पुथल मच जाती है जब मीता यह फ़रमान सुना देती है कि वह तब तक चैन से नहीं बैठेगी जब तक पिया का दाखि़ला टॉप फाइव स्कूलों में से एक में नहीं हो जाता। बस तभी शुरू होता है हाई-फाई स्कूल में दाखि़ले के लिए ख़ुद हाई-फाई बनने और बनते-बनते सड़क पर आ जाने का सिलसिला। यह मुसीबत कैसे आती है, क्या-क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं और पिया का एडमिशन हो पाता है या नहीं? यह जानने के लिए आपको हिंदी मीडियम देखनी पड़ेगी।

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साकेत चौधरी और ज़ीनत लखानी की कथा काफ़ी हद तक यथार्थपरक और ज़मीनी हकीकतों से जुड़ी है। दोनों ने मिल कर मध्यवगीर्य मानसिकता और द्वंदों को गहरे से पकड़ा है, उनके अनुसार उपयुक्त किरदार गढ़े हैं। पटकथा के मामले में भी दोनों ने इन किरदारों और इनके वृतांत को ऐसे कस के जमाया है कि यह बिल्कुल भी अपनी लीक से नहीं उतरते।  राज के फ़ोन पर ‘माता का बुलावा आया है’ वाली रिंगटोन, स्कूल के स्वीमिंग पूल में मां-बाप तैरने की मांग और पार्टी में अपनी बेटी के पसंदीदा गीत पर नाचना वह मौके हैं जब उसके अंदर का मध्यवगीर्य पुरूष, पति और पिता साक्षात नज़र आते है। मीता का सर्दियों में भी बच्ची को ओडोमॉस लगाना, बच्ची के झूले पर खेलने से पहले उसे साफ़ करना और विज्ञापनों से प्रभावित होकर ख़ुद को मार्डन और हाईजिनिक दिखाना भी इसी कड़ी में आते हैं। उसके साथ ही दाखि़ले के वक्त स्कूलों के बाहर लगने वाली कतारें और उनमें होने वाली नोक-झोक के यथार्थ को नाटकीयता के साथ बख़ूबी पेश किया है। इसके साथ ही बड़े स्कूल में एडमिशन दिलाने का लालच दिखा कर उसकी तैयारी करवाने के बहाने धंधा चमका रहे प्ले-स्कूल की असलियत पर से भी पर्दा उतारा गया है। दोनों लेखकों ने मिल कर अपने दोनों मुख्य किरदारों के मध्यवर्ग से पहले अमीर और फिर गरीब बनने के दौरान की दोहरी मानसिकता को बारीकी से उभारते हुए दिखाने की कोशिश की है कि मध्यवगीर्य सब कुछ करके भी ना तो पूरी तरह से अमीर बन पाता है और ना ही गरीब हो पाता है। फ़िल्म के शुद्ध ग़रीब (जिसकी परिभाषा भी फ़िल्म में बताई गई है) शाम प्रकाश (दीपक डोबरीयाल) की पत्नी तुलसी (स्वाति दास) का संवाद ‘गरीबी दो चार दिन में समझ नहीं आती’ चुनाव के दिनों में झोंपड़ी में जाकर खाना खाने वाले नेताओं और टैक्स बचाने के लिए एनजीओ चलाने वाले कोरपोरेट समाज सेवकों के गरीब फ्रेंडली दिखने के फ़ार्मुले पर गहरी चोट करता है। अमितोश नागपाल के दृश्यों के हिसाब से लिखे गए ऐसे अनेक सटीक संवाद गहरी छाप तो छोड़ते ही हैं, समाज के हाशियाग्रस्त समूह की आवाज़ बनने की भी कोशिश करते हैं। क्लाईमैक्स से पहले के हिस्से में शाम प्रकाश का संवाद, ‘हमे हमारा हक चाहिए, ख़ैरात नहीं’ इसी की एक बानगी है।


गहरे लेखन के बावजूद बतौर निर्देशक साकेत चौधरी अतिरेकता से बच नहीं पाते।  गरीब को तुरंत फैक्ट्री में नौकरी मिल जाना, राशन और पानी देने तक तो ठीक है लेकिन शाम प्रकाश का पड़ोसी के बच्चे की फ़ीस के लिए जान पर खेल जाना अतिरेकता की शिखर छू जाता है। अगर मान भी लिया जाए कि कोई ऐसा कर सकता है तो उसके लिए जिस तरह की विशेष प्रस्थिति और तनाव का माहौल होना चाहिए, चौधरी इस मामले में वह नहीं बना पाते हैं, जिस वजह से यह दृश्य कमज़ोर पड़ जाता है। ठीक उसी तरह स्कूल पहुंच कर शाम का इरादा एक दम से बदल जाना भी भावुकता तो पैदा करता है, लेकिन बदलाव लाने के लिए जिस प्रभाव की आवश्यकता थी, वह पर्दे पर उतना गहरा नहीं बन पाता। इसी कड़ी में शाम प्रकाश के भोलेपन की अतिरेकता सच्चाई पता लगते ही कैसे आक्रामक अतिरेकता में बदल जाती है और अगले ही पल फ़िर से भावुकता में, यह हज़म करना भी थोड़ा मुश्किल है। प्यार के साईड-इफेक्ट्स और शादी के साईडइ-इफ्ेक्टस जैसी फिल्में बना चुके साकेत पुरूष प्रधान मानसिकता के रूढ़िवाद से भी बच नहीं पाते हैं। शुरू से लेकर अंत तक नामी स्कूल में बच्ची को दाखिल करवाने की सनक केवल पत्नी को दिखा कर और पति को केवल पत्नी पीड़ित दिखा कर वह पुरूषवादी रूढ़ि को ही स्थापित करते नज़र आते हैं। केवल इतना ही नहीं अंत तक आते-आते वह सब कुछ ठीक कर देने और एक नैतिक नागरिक होने का श्रेय भी राज को ही देते हैं, जिससे प्रभावित होकर मीता अंततः उसका अनुसरण ही करती है।

हिंदी मीडियम का कथानक मध्यवर्ग के अमीर और गरीब के साथ द्वंद, अपने अंदरूनी द्वंद, पती-पत्नी के विरोधाभास, शिक्षण ढांचे का व्यवसायिकरण, स्कूल प्रबंधकों का लालच और बेईमानी जैसी कई परतों से गुंथा हुआ अनेक जटिलताओं को सहजता से पर्दे पर उतारते हुए प्रस्थितियों में से व्यंग्य पैदा करता हुआ गुदगुदाता भी है और भावुक भी करता है। इतनी परतों के बावजूद साकेत पूरी समस्या का एक पहलू ही दिखाते हैं और आम नागरिक को ही कटघरे में खड़ा करते हैं। ऐसा करते हुए वह पूरे शिक्षण ढांचे को धाराशायी करने में सरकार की भूमिका को छूते तक नहीं। उन्हें मध्यवर्ग की दोहरी मानसिकता भी नज़र आती है और उनके द्वारा गरीबों के हक छीनने का दर्द भी सताता है। उन्हें लोगों की सरकारी स्कूलों के प्रति बेरुखी भी कचोटती है और उसमें पढ़ने वाले गरीब बच्चों के हुनर को नज़रअंदाज़ किया जाना भी, लेकिन वह साल दर साल कम होते सरकारी शिक्षण ढांचे के बजट का कम होता आंकड़ा, सस्ते दामों पर प्राईवेट स्कूलों को दी जाने वाली सरकारी ज़मीनें और शिक्षा नीति की ख़ामियों को साफ़ तौर पर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। बावजूद इसके कि वह एक प्रेरक क्लाईमैक्स देते हैं, लेकिन कहीं न कहीं वह उपरोक्त पहलुओं को जानबूझ कर अनछुआ रखने के दबाव में अंत को अतार्किक मोड़ पर ला कर छोड़ देते हैं, इस ख़ामी की ढकने के लिए वह राज से एक भावुक भाषण दिलवाते हैं। अंततः वह इस धारणा को ही स्थापित करते हैं कि ढांचा तो बदलने से रहा ख़ुद ही बदल जाओ। हां, वह यह सकारात्मक संदेश ज़रूर दे जाते हैं कि अंग्रेज़ी मीडियम की होड़ छोड़ कर हमें हिंदी मीडियम की ओर लौट जाना चाहिए, लेकिन ऐसे माहौल में वह बच्चे आगे चल कर आज के मुकाबले की दौड़ में अपनी जगह कैसे बना पाएंगे इस पर फ़िल्म मूक रह जाती है, जबकि फ़िल्म की पूरी कथा का आधार यही मूल समस्या है, जिसके लिए मीता अपने बेटी को इंगलिश मीडियम में भेजना चाहती है।


इरफ़ान ख़ान के बारे में बस इतना कहना काफ़ी होगा कि उन्हें मौका मिले तो वह कुछ भी बन के दिखा सकते हैं, लेकिन शायद ही कोई ख़ान, कपूर या कुमार इरफ़ान ख़ान बन पाए। उन्होंने राज बतरा के किरदार को बहुत तन्मयता से जिया है। मीता के किरदार में भारतीय फ़िल्मों के ज़रिए पर्दे पर पहली बार दस्तक दे रही पाकिस्तानी अदाकारा सबा कमर भी तीनों ही रूपों को सहजता से जी गई हैं। ख़ास कर गरीब वाले किरदार की मनोस्थिति, हाव-भाव और अदागयी को उन्होंने बेहतरीन तरीके से निभाया है। दीपक डोबरियाल अब तक गुदगुदाते रहे हैं, इस बार उनका भोलापन मोह लेता और भावुकता आखें नम कर जाती है। 

लक्ष्मण उत्तेकर कथा-पटकथा के अनुसार आवश्यक माहौल को पर्दे पर उतारने में सफ़लता रहे हैं और अमर मोहिले का बैकग्राउंड स्कोर इसमें व्यंग्य और नाटकीयता पैदा करने में बेहतरीन भूमिका निभाता है। कास्टिंग के लिए हनी त्रेहण का ज़िक्र करना भी लाज़मी है। पटकथा के लिहाज़ से फ़िल्म में संगीत नामात्र ही रखा गया है। अंत में बच्चों द्वारा गाया गया पंजाबी गीत ग़ालिब की मक़बूल ग़ज़ल ‘हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी की याद दिलाता है’ गायन और लेखन के मामले में यह एक प्रेरणादायी गीत बन पड़ा है। इंगलिश मीडियम स्कूलों के फलने-फूलने में अपनी भूमिका और अंग्रेज़ियत की मानसिकता को समझने के लिए यह फ़िल्म ज़रूर देखी जानी चाहिए, इसका हल्का-फ़ुल्का मनोरंजक अंदाज़ आपको गुदगुदाएगा और कुछ कड़वे सच आपको सोचने के लिए प्रेरित करेंगे।

*दीप जगदीप सिंह स्वतंत्र पत्रकार, पटकथा लेखक एवं गीतकार हैं।

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