मोदी की नीयत बनाम जियो की नीयति

-दीप जगदीप सिंह-
जियो इंस्टीच्यूट के पैदा होने से पहले ही उसे ‘इंस्टीच्यूट ऑफ एमिनेंस’ का तमगा देने पर बवाल मचा हुआ है, जियो इंस्टीच्यूट की नियति क्या होगी यह तो भविष्य तय करेगा, लेकिन इस फ़ैसले ने मोदी सरकार की देश की शिक्षा नीति और देश के नौजवानों के भविष्य को लेकर नीयत एक बार फिर साफ़ कर दी है। एक तरफ़ मोदी सरकार ने जहां 17 दिग्गज़ों की कमेटी बना कर उन्हें भारत के इतिहास का भगवाकरण करने के काम पर लगाया हुआ है तो दूसरी तरफ़ तेज़ी से समूचा शिक्षा ढांचा और नीति कॉरपोरेट और निजी फ़ायदे के अनुरूप ढाली जा रही है। ऐसे में जियो इंस्टीच्यूट के नामो निशान तक ना होने के बावजूद उसे उत्कषर्टता का अस्थायी दर्जा देना भी हैरान करने वाली बात नहीं है। बल्कि इस कदम से मोदी सरकार ने तो खुले तौर पर ऐलान कर दिया उसकी शिक्षा नीति की दिशा और दशा क्या होगी और उसे किससे हित सर्वोपरि हैं।




इतना हंगामा क्यों है बरपा?
जैसे ही कल शाम को जियो इंस्टीच्यूट को इंस्टीच्यूट ऑफ़ एमिनेंस देने की घोषणा हुई तभी से सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक और शैक्षिणक गलियारों में हाहाकार मच गया। जब खोजने की कोशिश की गई तो पाया गया कि अभी तक जियो इंस्टीच्यूट का कोई नामो-निशान तक नहीं है, तो बड़े-बड़े शिक्षाविदों ने सवाल उठाया कि जो संस्थान दशकों से चल रहे हैं उन्हें सूची से बाहर रखा गया है, जबकि जिस संस्थान का अभी अपना कोई ठिकाना नहीं, अता-पता नहीं, यहां तक कि वेबसाईट भी नहीं, उस संस्थान को यह रुतबा किस आधार पर दिया गया। राजनीतिक पंडितों ने तो यहां तक कहा कि पिछले चुनाव में मिले पार्टी फंड के बदले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ऋण उतार रहे हैं और 2019 के चुनाव के लिए फंड का इंतज़ाम भी कर रहे हैं। बवाव मचा तो विदेश दौरे पर गए हुए मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कुछ दस्तावेज़ देकर बचाव किया।

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बचाव की मुद्रा में सरकार!
जावड़ेकर द्वारा जारी किए गए दस्तावेजों और टवीट में उन्होंने कहा कि ग्रीन कैटेगरी में 11 एप्लीकेशन प्राप्त हुए, जिन का मूल्यांकन ज़मीन की उपलब्धता, बेहद उच्च योग्यता की कोर टीम और विस्तृत अनुभव, निवेश के लिए पूंजी, सलाना लक्ष्य के साथ रणनीतिक योजना और कार्य योजना इन चार मापदंडों पर किया गया, जिस में केवल जियो इंस्टीच्यूट को ख़रा पाया गया। साथ ही उन्होंने कहा कि अभी जियो इंस्टीच्यूट को कच्चा (प्रोवीज़नल) प्रमाण पत्र दिया गया है अगर रिलासंय अगले तीन सालों में संस्थान स्थापित कर लेगा तो दोबारा मूल्यांकण के बाद उसे पक्का प्रमाण पत्र दिया जाएगा।

रियालंस के चुने जाने के बारे में कहा गया है कि वह 60 करोड़ रुपए के शुरूआती निवेश के साथ अगले दस साल के लिए हर साल 150 करोड़ रूपए ख़र्च करेगा। इसके अलावा 500 करोड़ रूपए का अतिरिक्त फ़ंड इस काम के लिए सुरक्षित रखेगा। साथ ही रिलायंस फ़ाउंडेशन ने 1000 करोड़ रुपए और जुटाने की पक्की योजना का ख़ाका भी पेश किया है। इस तरह जियो इंस्टीच्यूट को बनने से पहले इंस्टीच्यूट ऑफ एमिनेंस का ठप्पा देने के लिए चुन लिया गया है।

सोचने वाली बात क्या है?


जैसे कि मैंने शुरू में कहा यह सरकारी संस्थानों को कमज़ोर कर शिक्षा क्षेत्र में निजी संस्थानों का दबदबा बढ़ाने का एक कदम है। इसके साथ ही निजी संस्थानों को लाभ पहुंचाने के लिए सरकार शिक्षा नीति की लगाम भी इनके हाथों में थमाने जा रही है, जो काफ़ी हद तक पहले ही कुकुरमत्तों की तरह उग आई निजी यूनिवर्सिटियों में देखने को मिल रहा है, जहां पर शिक्षा का स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है।

ग्रीन कैटेगरी के लिए जो नियम एवं शर्तें बताई गई हैं, वह देखने में ही रिलायंस के पक्ष में बनाई गई लगती हैं। रिलांयंस को अपने इंस्टीच्यूट के लिए सरकारी फंड की आवश्यकता नहीं है, बल्कि सरकार द्वारा इंस्टीच्यूट ऑफ एमिनेंस की मान्यता पाकर वह अपने दूसरे बिजनेसों और विदेशी कंपनियों से रिलायंस फ़ाउंडेशन के लिए टैक्स रहित मोटा चंदा जमां कर सकते हैं। रिलायंस कंपनी की समाज सेवी संस्था रिलायंस फाउंडेशन जियो इंस्टीच्यूट चलाएगी। इन्हें मनमर्ज़ी के कोर्स चलाने और फ़ीस तैय करनी की आज़ादी होगी और यूजीसी जैसे किसी संस्थान का डंडा भी नहीं होगा। पिछले दिनों एनडीटीवी के प्राईम टाईम पर रवीश कुमार ने खुलासा किया है किस तरह निजी मेडिकल संस्थान बच्चों से करोड़ों की फ़ीस वसूल रहे हैं, जिसके दबाव के चलते यूवा आत्म-हत्या तक कर रहे हैं। ऐसे में अरबों रुपए के निवेश से बनने वाले निजी संस्थानों से आम जन तक शिक्षा पहुंचाने की कितनी उम्मीद की जा सकती है। बल्कि इंस्टीच्यूट को ग्लोबल बनाने के चक्कर में साधारण कोर्सेस की फ़ीस और महंगी होगी जिनके ज़रिए कॉरपोरेट एवं मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करने वाले सस्ते कामगार तैयार किए जाएंगे। जब जियो संस्थान मार्केट ओरियेंटेड कोर्स चला कर दुनिया के टॉप इंस्टीच्यूट्स में आएंगे तो उससे दूसरे शिक्षण संस्थानों पर भी ऐसे कोर्स चलाने का दबाव बढ़ेगा। कलात्मक, भाषा, ज्ञान, सृजनात्मकता और युवाओं के व्यक्तित्व विकास का कमज़ोर हो चुका समूचा शिक्षण ढांचा तहस-नहस हो जाएगा और डीज़ल-पेट्रोल के दाम की ही तरह शिक्षा और रोज़गार का मूल्य भी पूरी तरह से बाज़ार ही तय करेगा। 

सरकार की नियत पर शक पैदा करने वाली और भी बाते हैं जैसे एम्पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी ने ग्रीनफ़ील्ड कैटेगरी में आवेदन करने वाले दो संस्थानों इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ हयूमन सेटलमेंट, बेंगलूरु और इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ पब्लिक हैल्थ, गांधीनगर को एमिनेंस के लिए तो नहीं चुना लेकिन कैटेगरी 1 में रख कर स्वायत्तता देने की सिफ़ारिश की है। दिलचस्प बात यह है कि यह दोनों ही संस्थान पहले से चल रहे हैं। इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ पब्लिक हैल्थ, गांधीनगर की स्थापना 2015 से हुई और इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ हयूमन सेटलमेंट, बेंगलूरु 2008 से चल रहा है। इन दोनों ही संस्थानों ने इंस्टीच्यूट ऑफ एमिनेंस के लिए आवेदन किया ताकि यह अपने संस्थानों को विश्व स्तर की यूनिवर्सिटियां बना सकें। जबकि रिलायंस के पास तो ऐसा भी कोई अनुभव नहीं है फिर जियो इंस्टीच्यूट पर इतनी मेहरबानी क्यों?

वहीं जवाहर लाल नेहरू यूनिवसिर्टी, पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ जैसे कई पुराने और अनुभवी शिक्षण संस्थानों के भी इस सूची में शामिल ना हो पाने पर सब को हैरानी हुई है। इस बारे में एम्पॉवर्ड एक्सपर्ट कमेटी के चेयरमैन एन. गोपालास्वामी ने इकोनॉमिक्स टाईम्ज़ को दिए इंटरव्यू में कहा है कि जिस संस्थान ने पिछले तीन चरणों में अपनी एक्रिडेशन की रेंकिंग में सुधार नहीं किया है, उन पर भरोसा नहीं हो पाया कि वह यह लक्ष्य पूरा कर पाएंगे। गोपालास्वामी की दलील है कि अमेरिका व इंगलैंड के जो संस्थान टॉप 500 में हैं वह सौ साल पुराने हैं, जबकि भारत के संस्थान काफ़ी नए हैं। तो फ़िर तीन साल बाद बनने वाला जियो इंस्टीच्यूट कैसे 100 साल पुरानों को मात दे देगा? उसके पास ऐसी कौन सी कोर टीम है, जो 10 सालों के अंदर जियो इंस्टीच्यूट को दुनिया के टॉप 500 इंस्टीच्यूट्स में शामिल कर देगी। जबकि जो शिक्षण संस्थान दशकों पुराने हैं (पंजाब यूनिवसिर्टी की पुनः स्थापना सन 1947 में हुई, मूल स्थापना सन 1882) , जिनके पास अनुभव और ढांचा है, जो सरकार की अनदेखी का शिकार हो कर घिसट रहे हैं, अगर उनके ढांचे में सुधार करके सरकार उनके एक्रिडेशन रैंक को बेहतर बनाने में सहयोग क्यों नहीं कर रही? अगर उन्होंने एक्रिडेशन रेंकिग को ही एमिनेंस के लिए आधार बनाना था तो सरकारी यूनिवर्सिटियों की एक्रिडेशन को बेहतर बनाने के लिए बेसिक मापदंडो जैसे स्टाफ़, परीक्षा के नतीजे, रिसर्च का माहौल और मूलभूत सुविधाएं की कमी के लिए सरकार की भूमिका का भी संज्ञान लिया जाना चाहिए था। बहुत सारी युनिवर्सिटियां स्टाफ़ के वेतन और अन्य बेसिक सुविधाओं के लिए आवश्यक बजट अनुदान पाने के लिए ही सालों से घिसट रही हैं। ऐसे में जो बच्चा तीन साल बाद पैदा होगा उसे कोख में आने से पहले ही मोदी सरकार ने गोल्ड मैडल थमा दिया और जो दशकों से दौड़ रहे हैं उन पर इतना भी भरोसा नहीं है कि अगर सरकार शिक्षा क्षेत्र की अपनी वित्तीय एवं प्रशासनिक ज़िम्मेदारियों का निर्वाह ठीक से करे तो वह भी एक्सिलेंस के मापदंडों पर ख़रे उतर सकते हैं। उस पर भी हैरानी की बात है कि सरकार चुन-चुन कर आरएसएस से जुड़े विद्वानों को यूनिवर्सिटयों से लेकर यूजीसी और अन्य उच्च शिक्षा और शिक्षा नीति गढ़ने वाले संस्थानों में बिठा रही है, तो क्या सरकार को ख़ुद अपने ही बिठाए उप-कुलपतियों और अफ़सरशाहों की काबलियत पर ही भरोसा नहीं है कि वह उन संस्थानों को भविष्य में उत्कर्षटता के उस स्तर पर ला पाएंगे कि सरकार अपने चहेतों के सरकारी संस्थानों को एमिनेंस का प्रमाण पत्र दे सके। क्या जियो से जी भर लगाव करते-करते मोदी सरकार का अपने ही चुने हुए विद्वानों से भरोसा उठ चुका है? या फ़िर उन्हें सिर्फ़ भगवाकरण कर संस्थानों का धीरे-धीरे कमज़ोर करने के लिए ही बिठाया गया है और इस मामले में उन पर पूरा भरोसा है?

एक और बात सरकार की नीयत पर सवाल खड़ा करती है। इंटरव्यू में गोपालास्वामी की दलील है कि ग्लोबल रैंकिंग के लिए टीचिंग से ज़्यादा रिसर्च की बड़ी भूमिका है और पिछले दशकों में सरकारी संस्थानों ने तो रिसर्च में काफ़ी निवेश किया है, लेकिन नए होने की वजह से प्राईवेट इंस्टीच्यूट ज़्यादा टीचिंग पर ध्यान दे रहे हैं, इस लिए एमिनेंस के लिए उनका का चुनाव नहीं किया गया। लेकिन गोपालास्वामी इस बात को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं कि सरकारी संस्थानों में लगातार रिसर्च का दायरा घटाया जा रहा है, रिसर्च की सीटें कम की जा रही हैं और बहुत सारे सब्जेक्टस की रिसर्च बंद ही कर दी गई है। इसके साथ ही यूनिवर्सिटियों में रिसर्च का माहौल भी ख़त्म किया जा रहा है। जब गोपालास्वामी यह इंटरव्यू दे रहे थे, उसी समय यूजीसी ने एक आदेश जारी कर देश भर की यूनिवर्सिटियों के 7255 में से 4305 रिसर्च जरनलज़ (शोध पत्रिकाएं) की मंज़ूरी रद्द कर दी है, जिस में ज़्यादा भारत की विभिन्न राज्यों की भाषाओं, धर्म अध्ययन से लेकर अर्थ-शास्त्र और राजनीति शास्त्र तक के रिसर्च जरनल शामिल हैं। इस तरह लगातार सरकारी संस्थानों में शोध को कमज़ोर किया जा रहा है और उन निजी संस्थानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है जो स्क्लि डेवलेपमेंट के नाम पर सस्ते कामगारों का उत्पाद कर रहीं है और युवाओं में रचनात्मकता और रिसर्च एप्टीटयूड को ख़त्म कर रही हैं। गोपालास्वामी ने कहा कि कि जो संस्थान चुने नहीं जा सके उन में मुख्य कमी रिसर्च को लेकर सही दृष्टी ना होना मुख्य वजह है। तो क्या वह इस बात पर रौशनी डालने की चेष्टा करेंगे कि इस दृष्टि को कमज़ोर करने और विकसित ना होने देने में सरकार की भूमिका को कहां रखेंगे?

जेएनयू से लेकर बनारस हिंदू यूनिवसिर्टी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, हैदराबाद यूनिवर्सिटी से लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी और पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ में जो माहौल पैदा किया गया है वह देश के शिक्षण संस्थानों को दुनिया में टॉप रेंकिंग में ले जाने की नहीं कुटिल राजनीतिक मंशाओं को उजागर करता है। ऐसे में जियो इंस्टीच्यूट को सिर-आंखों पर बिठाने का मामला उसी दिशा में आगे बढ़ा हुआ एक कदम नज़र आता है।

भारत को दुनिया के टॉप रेंकिंग इस्टीच्यूट में लाने की नियति में जियो इंस्टीच्यूट की प्रि-मेच्योरेड एमिनेंस कितनी कारगर साबित होगी यह तो वक्त तय करेगा लेकिन मोदी सरकार की नीयत जिस तयशुदा तरीके से काम कर रही है, उस पर में हमें आज ही विचार करना होगा।
{लेखक के निजी विचार हैं।}

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