Monday, 21 March 2016

Film Review | कपूर एंड संस

बेमेल रिश्तों की बेजोड़ कहानी

दीप जगदीप सि‍ंह | रेटि‍ंग 3/5

कपूर एंड संस बेमेल रिश्तों की बेजोड़ कहानी है। तीन पीढ़ियां हैं, हर पीढ़ी का अपना द्वंद है, हर पीढ़ी के अंर्त-द्वंद हैं। हर पीढ़ी पिछली और अगली पीढ़ी से टकरा रही है,  
 
 अपनी पीढ़ी से भी लड़ है और खुद से भी लड़ने को मजबूर है। हर पीढ़ी के कुछ छुपे हुए झूठ हैं, कुछ जग जाहिर सच हैं, मन की गांठे हैं, रिश्तों के खुले हुए धागे हैं। कपूर एंड संस में वह सब कुछ है जो मेरे घर, आपके घर, आपके पड़ोसी के घर में होता है। जहां पर कोई परफेक्ट नहीं होता, लेकिन फिर भी रिश्ते परफेक्टली निभाने की कोशिश की जाती हैं। नब्बे साल के दादा (ऋषि कपूर) भरपूर ज़िंदगी जीने के बाद अब मरने की रिहर्सल कर रहे हैं। खाने की टेबल से लेकर बिस्तर पर पहुंचने से पहले तक वह दिखाना चाहते हैं कि अगर वह यूं ही कुछ करते करते मर गए तो कैसे दिखेंगे। उनका बड़ा बेटा हर्ष कपूर (रजत कपूर) और बहू सुनिता कपूर (रत्ना पाठक शाह) एक तरफ दादा की अठखेलियों से परेशान हैं तो दूसरी ओर घर की पतली आर्थिक हालत से दोनों के अंदर कुंठा भर रही है। हर्ष अटकी पड़ी आमदन पर उम्मीद टिकाए बैठा है तो सुनीता अपनी बहन के सफल केटरिंग बिज़नेस से प्रेरित हो खुद का बिज़नेस शुरू करना चाहती हैं। लेकिन एक दूसरे पर खत्म हो चुका भरोसा दोनो की तकरार का बीज है, हर्ष की सहकर्मी अनु (अनुराधा चंदन) भी सुनिता की आंख में खटकती है। हर्ष का बड़ा और बैस्ट सैलर राइटर बेटा राहुल कपूर (फवाद ख़ान) लंडन में रहता है और बैस्ट सैलर राइटर बनने के लिए जूझ रहा, पार्ट टाईम बार टैंडर बेटा अर्जुन कपूर (सिद्धार्थ मल्होत्रा) न्यू जर्सी में रहता है। अर्जुन को लगता है उसके नॉवेल की कहानी चुराकर ही राहुल बैस्ट सैलर बना है और उसके मां-बाप उसकी बजाए सफल बेटे राहुल को ज़्यादा प्यार करते हैं। इस वजह से दोनों में ठनी हुई है। एक दिन अचानक राहुल को फोन आता है कि हार्ट अटैक की वजह से दादा आईसीयू में हैं, वह अर्जुन को साथ लेकर कन्नूर अपने घर आ जाता है। दादा की आख़री ख्वाहिशों में से एक हैं मरने से पहले पूरे परिवार के साथ हैप्पी फैमिली फोटो खिंचवाना।

film review kapoor and sons


मां-बाप के लड़ाई झगड़े में राहुल और अर्जुन की दबी हुई तकरार भी उजागर हो जाती है। इसी बीच दोनों की मुलाकात मुंबई से कुन्नूर में अपना बंगला किराए पर देने के लिए आई खिलंदड़ टीया मलिक से होती है। टीया हॉट राहुल पर लटू हो जाती है और नशे में उसे किस कर लेती है, इधर अर्जुन भी टीया को दिल दे बैठता है। एक नया द्वंद शुरू होता है। दादा के जन्मदिन पर उनकी आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए उनका छोटा बेटा शशि कपूर (विक्रम कपाड़िया) भी अपने परिवार के साथ कन्नूर आ पहुंच जाता है। जैसे ही हैप्पी फैमिली फोटो होने लगता है, उसी दौरान कुछ ऐसे पर्दे खुलते हैं कि चाह कर भी कुछ किरदार फोटो में हैप्पी नहीं हो पाते और फोटो होती-होती रह जाती है। आगे की कहानी यही है कि कैसे टूटन के शिखर पर पहुंचे रिश्तों की दरारें भरी जाती हैं? कैसे गल्तफहमियां को दूर कर खामियों को सविकार कर रिश्तों के धागे जुड़ते हैं।


सैंकेंड हाफ के मध्य तक हल्की फुल्की तरकार, प्यार, नाच-गाने और किरदारों के मन की परतें खोलने में गुज़र जाता है। मनोरंजक होते हुए भी कहानी आगे बढ़ती हुई महसूस नहीं होती। लेकिन निर्देशक शुकन बत्रा ने आयशा दावित्रे के साथ मिल कर लिखी कहानी के दृश्य इतनी बारीकी से एक दूसरे के साथ बुने हुए हैं कि दर्शकों को बांधे रखती है। शुकन बत्रा, आयशा दावित्रे और सपंदन मिश्रा के संवाद के साथ टुकड़ों में दृश्य गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। काम करते हुए प्लंबर के साथ ही किरदारों की चल रही तरकार और अलिया का अपने पेरेंट्स से जुड़ा किस्सा सुनाने वाले दृश्य यादगार हैं। सैंकेड हाफ के मध्य के बाद कहानी गंभीर मोड़ लेती है और एक सुखद अंत के साथ समाप्त होती है जो सुखद होते हुए भी एक खलिश सी छोड़ जाता है। यही इसको असली ज़िंदगी के ओर करीब ले आता है।


फिल्म को हूबहू रियलिस्टिक अंदाज़ में फिल्मा कर सिनेमेटोग्राफर जैफरी एफ. बेरमन ने इसे नाटकीय अतिरेकता से मुक्त रखा है। तकरार के दृश्य बेहद यथार्थपूर्ण तरीके से पर्दे पर उतरे हैं। फवाद ख़ान और आलिया रियलिस्टक फिल्म में ग्लैमर का तड़का लगाते हैं तो रजत शर्मा, रत्ना पाठक शाह और सिद्धार्थ मल्होत्रा ने अपनी किरदारों को बखूबी जिया है। ऋषि कपूर का भारी-भरकम उनकी अदाकारी पर भी भारी पड़ गया है। वह दिखने में तो 90 साल के दिखे हैं लेकिन उनकी आवाज़ और अंदाज़ में उनका खिलंदड़पना साफ झलकता है। शायद भारी मेकअप की वजह से उनकी अदाकारी और हाव-भाव में वह सहजता नहीं दिख पाई जिनकी उनसे उम्मीद थी। बाकी किरदार भी अपनी छाप छोड़ने में सफल रहते हैं। गीत-संगीत सिचुएशनल है, लेकिन ठीक-ठाक है बस। बैकग्राउंड स्कोर कहानी की मांग के अनुरूप माहौल का सृजन करता है।

ग्लैमर और अनरियलिस्टिक ड्रामा के दौर में एक आत्मीय कहानी को पर्दे पर उतारने के लिए इस बेमेल रिश्तों की बेजोड़ कहानी कपूर एंड संस को तीन स्टार!

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