Friday, 15 April 2016

Film Review | फैन

बस फैन्स के लिए ही है फैन

दीप जगदीप सिंह
रेटिंग 2.5 5

“फैन बस फैन होता है, लेकिन तुम नहीं समझोगे”, फिल्म का यह केंद्रीय संवाद फिल्म के लेखक और निर्देशक को बताने के लिए काफी है कि फैन बनते नहीं कमाए जाते हैं। फैन और सूपर स्टार के आपसी टकराव की कहानी “फैन” इस मामले में निराश करती है, क्योंकि फिल्म में ज़ब्रदस्त मसाला होने के बावजूद वो आत्मीयता नहीं है जो एक फैन और सूपर स्टार में होती है।
 
गौरव चानणा (शाहरूख खान) पश्चिमी दिल्ली में रहने वाला 25 साल का एक साधारण लड़का और फिल्म स्टार आर्यन खन्ना (शाहरूख खान) का सूपर फैन है, जिसकी सूरत भी काफी हद तक आर्यन से मिलती है। कालोनी में हर साल दहशरे के मेले में होने वाले एक्टिंग कंपीटीशन में वह आर्यन खन्ना के सदाबहार अंदाज़ और संवादों की एक्टिंग करके ट्राफी जीत लेता है। इस बार मिले इनाम के पैसों से वह अपने फेवरेट सूपर स्टार से मिलने मुंबई जाता है बिल्कुल उसी की तरह राजधानी एक्सप्रैस में बेटिकट और उसी होटल में ठहरता है जिसमें उसका सूपर स्टार पहली बार रहा था। 

उसकी तमन्ना अपने चहीते सितारे को अपनी ट्राफी दिखाना और उसके साथ पांच मिनट बिताना है। सपनों में खोया गौरव जब आर्यन के बर्थडे पर उसके बंगले के सामने जाकर हकीकत से रूबरू होता है तो निराश हो जाता है और अपने स्टार से मिलने के लिए ऐसा रास्ता अपना लेता है जिससे उसका स्टार ही नाराज़ होकर उसे पुलिस से पिटवा देता है।

अपने चहीते सितारे का यह रूप देख कर गौरव उसे माफी मांगने के लिए मजबूर करने और यह जताने की ठान लेता है कि फैन है तो सूपर स्टार है, फैन नहीं तो स्टार नहीं। अपनी जि़द पूरी करने के लिए वह किस हद तक गुज़र जाता है, यह फैन का सबसे थ्रिलिंग और विस्मित कर देने वाला हिस्सा भी है और फिल्म की सबसे कमज़ोर कड़ी भी।

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लेखक हबीब फैसल ने शाहरूख ख़ान की असल जि़ंदगी की घटनाओं के गिर्द हाॅलीवुड फिल्म द फैन की तजऱ् पर कहानी गढ़ी है जिसमें बाज़ीगर और डर के शाहरूख ख़ान का तड़का लगाया गया है। निर्देशक मनीष शर्मा ने दोनो प्रमुख किरदारो के रूप में शाहरूख को खुद के आमने-सामने रख कर एक दिलचस्प पटकथा पर्दे पर उतारने की कोशिश तो की है। फस्र्ट हाॅफ तक फिल्म बिल्कुल रियलिस्टक और एक फैन व सूपरस्टार के आपसी द्वंद की कहानी लगती है लेकिन इंटरवल आते-आते ऐसा मोड़ आता है कि कहानी में आत्मीयता की बजाए हि‍ंसक अतिरेकता और फिल्मी बनावटीपना हावी हो जाता है। एक साधारण फैन के जेम्स बांड की तरह तेज़ तर्रार और ब्रूस ली जैसे एक्शन हीरो होने की बात गले नहीं उतरती।

उपर से सूपर स्टार का लंदन और दिल्ली की गलियों में अपने सनकी फैन के पीछे दौड़ते फिरना, उसके मां-बाप और गर्लफ्रैंड के ज़रिए उसको उकसाने की कोशिश करना बिल्कुल अटपटा लगता है। अंत से पहले गौरव का भरे मेले में गोली चलाना हास्यासद लगता है। अंत में फिल्म किसी स्टार की परछाई ना बन कर अपनी पहचान बनाने का संदेश तो देती है, लेकिन इसका भयावह अंत एक संवेदनशील दर्शक को सुन्न कर जाता है। पहले हाफ में गौरव के आर्यन की एक्टिंग की नकल करने वाले, दूसरे हाफ में आर्यन की छवि खराब करने और चेस सीन कुछ ज़्यादा ही लम्बे हैं, जो फिल्म को बोझल बनाते हैं। यह भी समझ नहीं आता कि शुरू से लेकर अंत तक काफी हद तक अलग दिखने वाले अर्यान और गौरव कुछ दृश्यों में इतने एक जैसे कैसे दिखने लग गए कि पूरी दुनिया धोखा खा गई। निर्देशक ने सिनेमैटिक आज़ादी के नाम पर संसपैंशन आॅफ डिसबिलीफ के नियम को भी धता बता दिया है।


अदाकारी के मामले में शाहरूख ने आर्यन के रूप में अपने किरदार को जी भर लिया है लेकिन गौरव के किरदार में वह प्रभावित करते हैं। एक सनकी फैन और दिल्ली के साधारण युवक के मनोभावों को उन्होंने बख़ूबी पर्दे पर उतारा है जो फिल्म को कुछ हद तक रियलिस्टिक टच देता है। अंत तक आते-आते उनमें डर और बाज़ीगर के अपने किरदारों की झलक देखने को मिलती है। दीपिका अमीन और योगेन्द्र टीकू ने गौरव के भावुक मां-बाप और श्रिया पिलगाओंकर ने दोस्त का किरदार को सार्थकता से निभाया है। अर्यान की पीए के छोटे किरदार में स्यानी गुप्ता छाप छोड़ती हैं। सिनेमेटोग्राफी फिल्म के मूड को दृश्यों के रूप में पकड़ती है, लेकिन बैकग्राउंड स्कोर काफी लाऊड है। फिल्म में कोई गीत शामिल नहीं किया गया है।

शाहरूख की फैन के रूप में अच्छी अदाकारी के लिए इस मसाला एंटरटेनर को ढाई स्टार!

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