Saturday, 27 January 2018

Film Review | Padmavat | फ़िल्म रिव्यू | पद्मावत

दीप जगदीप सिंह | रेटिंग 2/5

संजय लीला भंसाली की पद्मावत इतिहास नहीं, बल्कि मलिक मोहम्मद जयसी की काव्य कल्पना का दृश्यात्मक वर्णन है। भंसाली के चिरपरिचित अंदाज़ में यह ज़रूरत से ज़्याद खिंचा हुआ और विहंगम बनाने की कोशिश में अत्यधिक डार्क हो गया है।
 
कहानी बिल्कुल सीधी है, सिंघल की राजकुमारी पद्मावति बला सी खूबसूरत है, जिस पर चितौड़ का रावल रत्न सिंह मोहित होकर उसे ब्याह ले जाता है। उधर दुनिया जीतने की लालसा में अपनो का ही खून बहा कर अलाउदीन खिलजी हिंदुस्तान के तख़्त पर काबिज़ हो जाता है। एक तरफ़ रावल रत्न सिंह पद्मावति के साथ अपनी ज़िंदगी का आनंद ले रहा है 
तो दूसरी तरफ़ खिलजी पूरी धरती पर अपनी हकूमत चलाने का ख़ाब पूरा करने में जुटा है, तभी एक ऐसी साजिश होती है, जो खिलजी को कहने के लिए मजबूर कर देती है, सरहदें बोहत फैला दी, अब बाहें फैलाएंगे
लेकिन यह बाहें वह अमन के लिए नहीं अपनी हवस के लिए पदमावति की और फैलाता है। संजय लीला भंसाली विहंगमता के नाम पर अतिरेकता की हदें पार कर जाते हैं। अलाउदीन खिलजी को क्रूर दिखाने के लिए उसके चेहरे के ज़ख़्मों के साथ ही उसके गहरे रंग को भी उभारा गया है। उसे इतना क्रूर दिखाया गया है कि अपनी वासना के लिए वह अपने बचपन के दोस्त, अपने सगे चचा जो उसके ससुर भी हैं, अपनी बेगम, अपने भतीजे, यहां तक कि रानी पद्मावति काे पाने का रास्ता बताने वाले ब्राहमण को भी मार देता है। जिस तरह से भंसाली की विहंगमता की कोई हद नहीं खिलजी की वासना की भी नहीं, उसे रानियों, दासियों की चाहत तो है ही, दास भी उसकी पसंद का हिस्सा हैं।

यही नहीं भंसाली का खिलजी राम गोपाल वर्मा के कल्लू मामा के अंदाज़ में बाॅलीवुड का कोरियोग्राफड डांस भी करता है। भंसाली की पद्मावति पूरी तरह से खिलजी पर केंद्रित है, जिसे रणवीर सिंह ने पूरी क्ररता से निभाया है, उसके बाद कुछ हद तक रावल रत्न सिंह सक्रीन पर नज़र आते हैं, जिसे शाहिद काफ़ी हद तक सफलता से निभाते हैं, अगर भंसाली उन्हें बदन को थोड़ा ढीला भी छोड़ने देते तो भी उन के राजपूत राजा की आन कम नहीं होती। बचा खुचा बेहद कम हिस्सा रानी पदमावति के हिस्सा आया है, जिसे दीपिका पादुकोण ने ठीक-ठाक निभाया है। वैसे भंसाली ने उन्हें ज़्यादा मौका नहीं दिया।

Film Review | Padmavat | फ़िल्म रिव्यू | पद्मावत

फ़िल्म की पटकथा बेहद खिंची हुई है और पहले हाफ़ के मध्य के बाद बोर करने लगती है। आप बार-बार सोचते हो कि इंटरवल कब आएगा। दूसरा हाफ़ भी ज़रूरत से ज़्यादा खींचा हुआ है और फ़िल्म का अंत तो अब बच्चा बच्चा भी जानता है।


अगर आप इस लम्बे वीकएंड को थोड़ा फ़िल्मी बनाना चाहते हैं तो पदमावति देखी जा सकती है

रही बात करनी सेना की उन्हें तो भंसाली को सम्मानित करना चाहिए, क्योंकि उन्होंने फ़िल्म में राजपूतों की आन-बान-शान की गाथा का बख़ान किया है। वैसे खिलजी के बहाने भंसाली हर दौर की और ख़ास कर आज की घाग रक्त रंजित राजनीति पर गहरी टिप्पणी ज़रूर कर गए हैं। उनका डाॅयलाॅग इतिहास सिर्फ़ कागज़ पर नहीं लिखा जाता यही इशारा करता है




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